February 11, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

खबरें जरा हट के

*सृष्टि को दरिद्रता रूपी दुख से बचाने सुदामा ने अपने उपर लिया दरिद्रता का श्राप – पंडित सुयश दुबे।*

*सुदामा जैसा त्याग सच्चा मित्र ही कर सकता है।- पंडित सुयश दुबे।*

*मित्रता एक महत्वपूर्ण सम्बंध इसे निभाना पड़ता है – पंडित सुयश दुबे।*

*04 फरवरी 2024 रविवार को गीता हवन, सहस्त्र धारा एवं भोग भंडारे के साथ कथा को दिया जायेगा विश्राम।*


त्रिनेत्र टाइम्स नागेंद्र  शर्मा कोरबा।  सर्वधर्मार्थ कल्याण सेवा समिति के संस्थापक शिव पुराण श्रीराम कथा एवं श्रीमद भागवत कथा के मर्मज्ञ पंडित देवशरण दुबे जी के सुपुत्र पंडित सुयश दुबे जी की श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ कथा दिनांक 28 जनवरी को भव्य कलश यात्रा के साथ कोरबा एमपी नगर दशहरा मैदान निहारीका में आयोजित में प्रारंभ हुई।
जिसमे व्यासपीठ से पंडित सुयश दुबे जी अपनी संगीतमयी सुमधुर वाणी से शुक झांकी, कपिल चरित्र, वामन झांकी , प्रहलाद चरित्र, राम तथा कृष्ण जन्मोत्सव , गोवर्धन, रुक्मणी विवाह तथा रास झांकी की कथाओं से लगातार छह दिनों से श्रोताओं को रसपान करा कर जीवन में श्रीमद भागवत के माध्यम से आनंद एवं परमानन्द की प्राप्ति का उपाय बताया। उसी तारतम्य में आज श्रीमद भागवत कथा के सप्तम दिवस में सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनाया जिसे सुनकर श्रोतागण भावुक हो सजल हो गए।व्यासपीठ से पंडित सुयश दुबे जी ने सुदामा एवं श्री कृष्ण के मित्रता के विषय में बताते हुए कहा की अपने मित्र श्री कृष्ण एवं सृष्टि को दरिद्रता रूपी दुख से बचाने हेतु सुदामा जी ने अपने उपर जीवन भर की दरिद्रता का श्राप ले लिया। पंडित सुयश दुबे जी ने कथा प्रसंग में कहा की यद्यपि श्री कृष्ण के परम मित्र सुदामा की छवि से सभी भली-भांति परिचित हैं, लेकिन बहुत लोग उनके अपने मित्र के प्रति त्याग को नहीं जानते कि अपने परम मित्र श्रीकृष्ण को श्राप से बचाने के लिए सुदामा ने स्वयं एक दरिद्र का जीवन चुना था। यही कारण है कि सुदामा परम मित्र और भगवान के भक्त होते हुए भी इतने दरिद्र थे। उस समय की बात है एक अत्यंत गरीब ब्राह्मणी थी। जो भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करती थी लेकिन दुर्भाग्य से एक समय ऐसा भी आया जब उसे पांच दिनों तक भिक्षा नहीं मिली। पाचो दिन वह भगवान को याद करके सोती थी, छठे दिन उसे केवल दो मुट्ठी चना मिला। चना पाकर वह बहुत खुश हुई लेकिन जब वह झोपड़ी में पहुंची तो रात हो चुकी थी। उस ब्राह्मणी ने सोचा कि मैं इन चने को रात में नहीं खाऊंगी, सुबह भगवान को भोग लगाकर ही मैं इन्हें स्वीकार करूंगी। ऐसा सोचकर ब्राह्मणी ने चनों को एक कपड़े में बांधकर पोटली बनाकर रख दिया। और वह भगवान का नाम याद करके गहरी नींद में सो गयी । लेकिन दुर्भाग्य ऐसा की ब्राह्मणी के सोते ही कुछ चोर उसकी कुटिया में चोरी करने आए। लेकिन उस बेचारी ब्राह्मणी के कुटिया में चने के पोटली के अलावा कुछ नहीं था। चोरों को चने की वह पोटली मिली, चोर समझे कि इसमें कुछ क़ीमती रत्न हैं, ऐसा समझकर उसे चुरा लिये, उधर ब्राह्मणी जाग गई और शोर मचाने लगी। ब्राह्मणी का शोर सुनकर गांव के सभी लोग चोरों को पकड़ने के लिए दौड़े, चोर पोटली लेकर भाग गए। पकड़े जाने के डर से सभी चोर सांदीपनी मुनि के आश्रम में छिप गए। जहां सुदामा और भगवान श्री कृष्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। तब गुरुमाता को लगा कि कोई आश्रम के अंदर आ गया है, गुरुमाता देखने के लिए आगे बढ़ी, चोर को लगा कोई आ रहा है, चोर डर गए और आश्रम से भागने लगे।भागते-भागते चोरों से वो चने से भरी पोटली वहीं गिर गई, और सभी चोर भाग निकले। दूसरी ओर, वह ब्राह्मणी भूख से परेशान थी जब ब्राह्मणी को पता चला कि चोरों ने उसके चने की पोटली चुरा ली तो उनहोनें बड़े दुखी मन से श्राप दिया कि बेचारी असहाय का चना जो भी खाएगा वह दरिद्र हो जाएगा। वहीं जब सुबह गुरु माता आश्रम में झाडू लगा रही थी तब सफाई करते समय गुरु माता को वही चने की पोटली मिली। गुरु माता ने पोटली खोली तो देखा की उसमें चने थे। सुदामा और कृष्ण रोज की तरह जंगल से लकड़ी लाने जा रहे थे, तभी गुरुमाता ने उन्हें वही चने की पोटली दी और कहा कि भूख लगने पर दोनों इसे खा लेना फिर जैसे ही सुदामा जी ने चने की गठरी ली, उन्हें सारा रहस्य समझ में आ गया। क्यों, क्योंकी सुदामा ब्रह्मज्ञानी थे। सुदामा ने सोचा कि अगर श्री कृष्ण ने इस चने को स्वीकार कर लिया तो मेरे सखा मेरे मित्र श्री कृष्ण दरिद्र हो जायेंगे और श्री कृष्ण अर्थात पूरी सृष्टि दरिद्र और गरीब हो जाएगी। यही सोच कर उन्होंने वो सारे चने खुद खा लिये और उस गरीब ब्राह्मणी का श्राप अपने ऊपर ले लिया। लेकिन उन्होंने अपने मित्र श्रीकृष्ण को चने का एक दाना भी नहीं दिया। अपने मित्र श्री कृष्ण को दरिद्रता से बचाने के लिए सुदामा ने स्वयं अपना पूरा जीवन गरीबी में बिताया। ऐसे निभाई जाती है मित्रता। रामचरितमानस में भी लिखा है की “जे न मित्र दुख होंगी दुखारी, तिन्हहीं बिलोकत पातक भारी।”

अर्थात जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता उसको देखना भी पाप है। मित्रता एक महत्वपूर्ण सम्बन्ध है मुसीबत के समय काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है। इस दौरान कथा में श्री कृष्ण जी एवं सुदामा जी की अद्भुत झांकी प्रस्तुत की गई ।कथा में बड़ी संख्या में अंचलवासी श्रोतागण कथा श्रवण कर पुण्यलाभ प्राप्त कर रहे हैं। श्रोतागण ऐसी अद्भुत सुदामा एवं श्री कृष्ण की मित्रता की कथा सुन भाव विभोर हो गए । 04 फरवरी 2024 रविवार को गीता हवन, सहस्त्र धारा एवं भोग भंडारे के आयोजन के साथ कथा को विश्राम दिया जाएगा।कथा के अंत में श्रीमद भागवत भगवान जी की आरती कर प्रसाद वितरण किया गया । सर्वधर्मार्थ कल्याण सेवा समिति के कोरबा जिला शाखा प्रभारी डॉ.नागेंद्र नारायण शर्मा ने अंचलवासियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर भोग प्रसाद प्राप्त कर पुण्य लाभ प्राप्त करने की अपील की है। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप मे छत्तीसगढ़ शासन के वाणिज्य,उद्योग एवं श्रम मंत्री लखन लाल देवांगन, विशिष्ट अतिथि के रूप मे कोहड़िया के पार्षद नरेंद्र देवांगन, अतिथि के रूप मे डॉ. राजेश राठौर, नरेंद्र पाटनवार, डॉ.दिनेश वैष्णव, अनिल वस्त्रकार, रामकुमार, अनिल यादव उपस्थित थे। यजमान निर्मला शत्रुध्न प्रसाद दुबे, कुंती देवप्रसाद दुबे, प्रभा रामखिलावन पांडे, अनीता गिरधारी दुबे, सरस्वती संजय स्वर्णकार, लक्ष्मीन जागवत सिंह, गंगा समारूलाल साहू, निशा देव नारायण पांडे, सर्वधर्मार्थ कल्याण सेवा समिति के संस्थापक पंडित देवशरण दुबे, कोरबा जिला शाखा प्रभारी डॉ. नागेन्द्र नारायण शर्मा, कार्यकारिणी सदस्य पंडित योगेश पांडे, पंडित रामू तिवारी, पंडित गजेश तिवारी, पंडित अंकित पांडे, पंडित देवनारायण पांडे, पंडित प्रांजल पांडे, पंडित पुष्प राज दुबे, पंडित हर्ष नारायण शर्मा, नेत्रनन्दन साहू, अश्विनी बुनकर, कमल धारीया, चक्रपाणी पाण्डे, राजेश प्रजापति, भरत अग्रवाल, लता अग्रवाल, श्रीमती अंशु शर्मा, श्रीमती प्रतिभा शर्मा, रोहित पटेल, श्री शशि शर्मा, श्रीमती रेवती पटेल, श्रीमती सरिता अग्रवाल प्रसाद वितरण में सुरजीत राजेश शर्मा, सरिता जयप्रकाश अग्रवाल, अरुणा सुनील चन्ने के अलावा संगीत कलाकार मनोहर, हर्षित योगी, सुमित बरई, गोलू नामदेव, पुतुल प्रसाद, राघवेंद्र रघुवंशी, नागेन्द्र कमल एवं अंचलवासी विशेष रूप से उपस्थित होकर अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

 

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