पत्रकारिता पर पहरा नहीं, गलत करने वालों पर कार्रवाई हो; पोर्टल पत्रकारों को शक की नजर से देखना बंद करे व्यवस्था : अधिवक्ता धनेश कुमार सिंह
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प्रेस क्लब की सदस्यता नहीं है स्वतंत्र पत्रकारिता की अनिवार्य शर्त, संविधान देता है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; चंद लोगों की कथित गलतियों का ठीकरा पूरे डिजिटल मीडिया पर फोड़ना अनुचित, निष्पक्ष पत्रकारों को मिले सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// कोरबा। पत्रकारिता किसी प्रेस क्लब की चारदीवारी, किसी संगठन की सदस्यता अथवा बड़े समाचार संस्थान के पहचान पत्र तक सीमित नहीं है। पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य जनता की आवाज को सामने लाना, व्यवस्था से सवाल पूछना, अन्याय और अनियमितताओं को उजागर करना तथा लोकतंत्र में जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाना है। ऐसे में केवल इसलिए किसी वेब पोर्टल या स्वतंत्र पत्रकार को संदेह की दृष्टि से देखना उचित नहीं कि वह किसी बड़े समाचार पत्र, टीवी चैनल या पत्रकार संगठन से जुड़ा नहीं है। यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता के नाम पर अवैध वसूली, धमकी या भयादोहन करता है तो उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन कुछ लोगों के कथित कृत्यों के आधार पर पूरे डिजिटल पत्रकारिता जगत को कटघरे में खड़ा करना न्यायसंगत नहीं है। यह स्पष्ट और बेबाक बात शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता धनेश कुमार सिंह ने कही है।
उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता का स्वरूप बदल चुका है। अखबार और टेलीविजन के साथ वेब पोर्टल, डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र पत्रकार भी जनसमस्याओं को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और आम नागरिकों की परेशानियों से जुड़ी खबरें डिजिटल माध्यम से कुछ ही समय में हजारों लोगों तक पहुंच रही हैं। कई बार जिन समस्याओं पर लंबे समय तक ध्यान नहीं दिया जाता, वेब पत्रकारों की रिपोर्टिंग के बाद संबंधित विभागों को जवाब देना पड़ता है।
संविधान का अधिकार किसी संगठन की सदस्यता का मोहताज नहीं
अधिवक्ता धनेश कुमार सिंह ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। इसी संवैधानिक अधिकार में प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है। इसका अर्थ है कि नागरिक अपनी बात लेखन, समाचार, विचार और अन्य वैध संचार माध्यमों से समाज तक पहुंचा सकते हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए किसी प्रेस क्लब या पत्रकार संगठन की सदस्यता को सामान्य संवैधानिक अनिवार्यता नहीं माना जा सकता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन की सदस्यता, सरकारी अधिमान्यता, प्रेस पास और किसी सरकारी कार्यक्रम में प्रवेश की अनुमति अलग-अलग विषय हैं। किसी संगठन का सदस्य होना अपने आप सरकारी मान्यता नहीं देता और सदस्यता नहीं होने मात्र से किसी नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त नहीं हो जाती।
गलत करने वालों पर कार्रवाई हो, लेकिन सभी पत्रकारों को अपराधी न समझा जाए
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की आड़ में यदि कोई व्यक्ति अधिकारियों या व्यापारियों को धमकाता है, खबर प्रकाशित करने के नाम पर पैसे मांगता है अथवा किसी को डराकर अनुचित लाभ लेने का प्रयास करता है, तो यह गंभीर विषय है। ऐसे मामलों में शिकायत, साक्ष्य और निष्पक्ष जांच के आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी एक व्यक्ति के गलत आचरण को आधार बनाकर सभी पोर्टल संचालकों, संपादकों और संवाददाताओं पर संदेह करना कहां तक उचित है?
किसी व्यक्ति का गलत कृत्य पूरे पेशे की पहचान नहीं हो सकता। जिस तरह किसी एक कर्मचारी की गलती से पूरा विभाग दोषी नहीं हो जाता, उसी तरह किसी कथित फर्जी पत्रकार के कारण ईमानदारी से काम करने वाले सभी डिजिटल पत्रकारों की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
क्या क्लब की सदस्यता के बिना खबर प्रकाशित नहीं की जा सकती?
इस विषय पर भी अधिवक्ता ने महत्वपूर्ण बात रखी। उन्होंने कहा कि प्रेस क्लब और पत्रकार संगठन पत्रकारों के बीच संवाद, सहयोग और संगठनात्मक गतिविधियों के मंच हैं। इनकी अपनी उपयोगिता है, लेकिन इनकी सदस्यता को स्वतंत्र रूप से समाचार लेखन या अभिव्यक्ति का सार्वभौमिक कानूनी लाइसेंस नहीं समझना चाहिए। कोई नागरिक अपने वैध अधिकारों के तहत लेख, रिपोर्ट, ब्लॉग अथवा डिजिटल समाचार माध्यम से अपनी बात रख सकता है। हालांकि समाचार प्रकाशन से जुड़े लागू कानूनों, मानकों और जिम्मेदारियों का पालन करना भी आवश्यक है।
डिजिटल मीडिया पर भी लागू हैं जिम्मेदारियां और कानूनी नियम
उन्होंने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं है। किसी भी माध्यम से प्रकाशित समाचार में तथ्यात्मक सत्यता, निष्पक्षता और जिम्मेदारी जरूरी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कानून द्वारा निर्धारित उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था करता है। मानहानि, न्यायालय की अवमानना, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक आधारों पर लागू कानूनी सीमाओं का सम्मान करना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
डिजिटल समाचार और समसामयिक विषयों के प्रकाशकों के लिए सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के भाग-तीन में आचार संहिता और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी निर्धारित की गई है। इसलिए डिजिटल पत्रकारिता में अधिकारों के साथ जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
प्रशासन दोहरा रवैया न अपनाए, निष्पक्ष जांच के बाद ही हो कार्रवाई
अधिवक्ता धनेश कुमार सिंह ने प्रशासन से अपेक्षा जताई कि किसी भी पत्रकार के विरुद्ध शिकायत मिलने पर बिना पूर्वाग्रह के निष्पक्ष जांच की जाए। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित व्यक्ति पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो, लेकिन किसी पत्रकार को केवल उसके संगठन से बाहर होने, स्वतंत्र रूप से काम करने या डिजिटल पोर्टल से जुड़े होने के कारण अनावश्यक दबाव और भेदभाव का सामना न करना पड़े।
उन्होंने कहा कि शासकीय कार्यक्रमों, जनहित की बैठकों और प्रशासनिक गतिविधियों में मीडिया को लेकर पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए। पात्रता और निर्धारित नियमों के आधार पर डिजिटल मीडिया को भी उचित अवसर मिलना चाहिए। पत्रकारों की पहचान और विश्वसनीयता का आकलन उनके वास्तविक कार्य, समाचारों की गुणवत्ता और पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर होना चाहिए।
पत्रकारिता की पहचान उसका माध्यम नहीं, उसकी निष्पक्षता है
अंत में अधिवक्ता धनेश कुमार सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि जवाबदेह व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पत्रकार का काम केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर प्रशासनिक कमियों और जनसमस्याओं को भी सामने लाना है। आलोचनात्मक खबरों को व्यक्तिगत विरोध समझना या पत्रकारों को अनावश्यक रूप से दबाव में रखना स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं है।
उन्होंने दो टूक कहा कि कानून तोड़ने वाले को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए और कानून के दायरे में रहकर जनहित की पत्रकारिता करने वाले को प्रताड़ित भी नहीं किया जाना चाहिए। न पत्रकारिता के नाम पर वसूली स्वीकार्य है और न ही पत्रकारिता की आड़ में पत्रकारों का अपमान। स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकारिता को सम्मान एवं संरक्षण मिलना ही चाहिए।
जारीकर्ता : धनेश कुमार सिंह, अधिवक्ता, कोरबा।
