October 30, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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सादगी, अनुशासन और दृढ़ संकल्प की मिसाल थे लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल, देश की 562 रियासतों के एकीकरण में निभाई ऐतिहासिक भूमिका, जवाहरलाल नेहरू बने देश के प्रथम प्रधानमंत्री

 त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//  विशेष आलेख। भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिनका योगदान केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाता है। ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे भारत रत्न लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल। एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेकर देश की आजादी के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने और स्वतंत्र भारत को एक सूत्र में पिरोने तक का उनका सफर संघर्ष, त्याग, सादगी और अदम्य इच्छाशक्ति की असाधारण कहानी है। उन्हें भारत का लौह पुरुष और राष्ट्रीय एकता का शिल्पकार कहा जाता है।

31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ जन्म

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल और माता का नाम लाडबाई था। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, लेकिन बचपन से ही उनमें आत्मनिर्भरता, अनुशासन, साहस और नेतृत्व क्षमता के गुण दिखाई देने लगे थे।

उन्होंने कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां मिडिल टेंपल में अध्ययन कर बैरिस्टर बने। भारत लौटने के बाद अहमदाबाद में सफल वकालत शुरू की। आर्थिक रूप से संपन्न और प्रतिष्ठित वकील होने के बावजूद उनका जीवन धीरे-धीरे देशसेवा और जनकल्याण के लिए समर्पित होता चला गया।

खेड़ा और बारडोली आंदोलन ने बनाया जननेता

महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर सरदार पटेल स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। वर्ष 1918 में खेड़ा सत्याग्रह के दौरान उन्होंने किसानों को संगठित कर अंग्रेजी शासन के सामने उनकी समस्याओं को मजबूती से उठाया। इसके बाद वर्ष 1928 का बारडोली सत्याग्रह उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव बना।

अंग्रेजी शासन द्वारा किसानों पर बढ़ाए गए लगान के विरोध में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया। उनके कुशल संगठन और संघर्ष के परिणामस्वरूप आंदोलन को व्यापक सफलता मिली। इसी आंदोलन के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक ‘सरदार’ की उपाधि मिली। इसके बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख नेता के रूप में स्थापित हो गए।

आजादी की लड़ाई में जेल भी गए

सरदार पटेल ने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। उन्होंने अपना जीवन देश की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हितों के लिए समर्पित कर दिया।

प्रधानमंत्री पद के चयन में क्या हुआ था? 15 में से 12 समितियों का समर्थन

सरदार पटेल के जीवन का एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक प्रसंग वर्ष 1946 में सामने आया, जब स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चयन की प्रक्रिया चल रही थी। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसी नेतृत्व को आगे चलकर अंतरिम सरकार की कमान संभालनी थी।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, कांग्रेस की 15 प्रांतीय समितियों में से 12 ने सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम का समर्थन किया था। दूसरी ओर, जवाहरलाल नेहरू के नाम का किसी भी प्रांतीय कांग्रेस समिति ने प्रस्ताव नहीं किया था।

हालांकि यह प्रधानमंत्री पद के लिए प्रत्यक्ष मतदान नहीं था, बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए संगठनात्मक समर्थन और नामांकन की प्रक्रिया थी।

इस घटनाक्रम में महात्मा गांधी की पसंद जवाहरलाल नेहरू थे। गांधीजी की इच्छा का सम्मान करते हुए सरदार पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए और स्वतंत्रता के बाद 15 अगस्त 1947 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने।

इस प्रकार, व्यापक संगठनात्मक समर्थन मिलने के बावजूद सरदार पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने। उन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री बनाया गया। उन्होंने इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाया और देश के प्रशासनिक तथा राजनीतिक एकीकरण में ऐतिहासिक योगदान दिया।

562 रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर बनाया मजबूत भारत

15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन उस समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देशी रियासतों का एकीकरण था। सैकड़ों रियासतों के अलग-अलग रहने की आशंका देश की एकता के लिए गंभीर चुनौती थी।

ऐसे समय में सरदार पटेल ने अपनी कूटनीति, दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने वी.पी. मेनन के सहयोग से देशी रियासतों के भारतीय संघ में विलय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। लगभग 562 रियासतों के एकीकरण में उनकी निर्णायक भूमिका रही।

हैदराबाद, जूनागढ़ सहित कई जटिल मामलों का समाधान करते हुए उन्होंने स्वतंत्र भारत की राजनीतिक एकता को मजबूत आधार दिया। यही वह ऐतिहासिक योगदान था, जिसके कारण उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा गया।

ऐसा था उनका सादगीपूर्ण जीवन

सरदार पटेल का व्यक्तित्व जितना दृढ़ और अनुशासित था, उनका जीवन उतना ही सादगीपूर्ण था। किसान परिवार में पले-बढ़े होने के कारण वे आम लोगों की कठिनाइयों को अच्छी तरह समझते थे। उनका जीवन दिखावे और व्यक्तिगत वैभव के बजाय कर्तव्य, समय की पाबंदी, अनुशासन और राष्ट्रसेवा को महत्व देने वाला था।

वे खादी और सादे पहनावे को अपनाने वाले गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी थे। उनकी प्राथमिकता व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से अधिक देश और जनता के हित थे। उनकी पुत्री मणिबेन पटेल भी लंबे समय तक उनके साथ रहकर उनकी सार्वजनिक गतिविधियों में सहयोग करती रहीं।

उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि महानता पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से नहीं, बल्कि व्यक्ति के कर्म, विचार और समाज के प्रति उसके योगदान से बनती है।

15 दिसंबर 1950 को हुआ निधन, 1991 में मिला भारत रत्न

सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में हुआ। देश ने एक ऐसे महान नेता को खो दिया, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की नींव मजबूत करने में असाधारण भूमिका निभाई थी। उनके ऐतिहासिक योगदान के सम्मान में वर्ष 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

31 अक्टूबर को उनकी जयंती राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में भी मनाई जाती है। गुजरात के केवड़िया में स्थापित उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ उनके विराट व्यक्तित्व और राष्ट्रीय एकता के प्रति उनके योगदान का प्रतीक है।

आज भी प्रासंगिक हैं सरदार पटेल के विचार

सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रेरणादायक पाठशाला है। उन्होंने दिखाया कि मजबूत इच्छाशक्ति, संगठन क्षमता, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण से असंभव दिखाई देने वाले कार्य भी पूरे किए जा सकते हैं।

उनकी 151वीं जयंती पर उन्हें याद करना देश की एकता, अखंडता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकजुटता के संकल्प को दोहराने का अवसर है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह प्रेरणा देता रहेगा कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर राष्ट्रहित और समाजहित को स्थान देना ही सच्ची देशसेवा है।

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