कोयले की सुरंगों में तकनीक की नई कहानी: सिंघाली में देश की पहली पेस्ट फिल परियोजना, विकास के साथ ग्रामीण हितों का संतुलन
1 min read



भूमिगत खनन के खाली हिस्सों को भरने की आधुनिक तकनीक से बढ़ेगी सुरक्षा, बंद पड़ी खदानों के संसाधनों के दोबारा उपयोग की भी खुल सकती है राह
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** कोरबा। कोयला खनन के क्षेत्र में कोरबा एक बार फिर तकनीकी बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम का गवाह बन रहा है। सिंघाली भूमिगत कोयला खदान में विकसित की जा रही पेस्ट फिल परियोजना को देश की पहली ऐसी पहल बताया जा रहा है, जिसमें भूमिगत खनन के बाद निर्मित खाली स्थानों को उपयुक्त सामग्री से भरने की तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।
यह परियोजना साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के अंतर्गत ठेकेदार TMC Mineral Resource द्वारा विकसित की जा रही है। परियोजना के सफल होने पर भूमिगत कोयला खनन में पेस्ट फिल तकनीक के व्यावहारिक इस्तेमाल का महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त होगा, जिसका लाभ भविष्य की परियोजनाओं में भी लिया जा सकता है।
खदान के खाली हिस्से होंगे ‘फिल’, सुरक्षा को मिल सकता है नया आधार
भूमिगत खनन के दौरान कोयला निकालने के बाद भूमिगत क्षेत्र में खाली स्थान बनते हैं। पेस्ट फिल तकनीक में इन खाली स्थानों को उपयुक्त सामग्री से भरने का उद्देश्य भूमिगत संरचना को अधिक स्थिर बनाना और संभावित भू-धंसान जैसे जोखिमों को कम करने में मदद करना है।
यदि सिंघाली परियोजना अपने निर्धारित तकनीकी और सुरक्षा मानकों के अनुरूप सफल होती है, तो यह भूमिगत खनन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तकनीकी अनुभव साबित हो सकती है।
विशेषज्ञता और अनुभव के स्तर पर इसका महत्व केवल सिंघाली तक सीमित नहीं माना जा रहा। भविष्य में बंद या खनन से बाहर पड़ी भूमिगत खदानों में उपलब्ध कोयला भंडार के पुनः उपयोग की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जा सकता है।
अभी उत्पादन नहीं, निर्माण और निवेश के चरण में परियोजना
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वर्तमान में सिंघाली खदान में कोयला उत्पादन शुरू नहीं हुआ है। परियोजना अभी निर्माण, विकास और निवेश के चरण में है।
ऐसे में परियोजना को निर्धारित समय-सीमा के भीतर आगे बढ़ाने के साथ तकनीकी गुणवत्ता, पर्यावरणीय मानकों और श्रमिक एवं जनसुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना आवश्यक है।
ग्रामीण सुविधाओं पर भी प्रबंधन का फोकस
परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर उठने वाली चिंताओं के बीच प्रबंधन की ओर से ग्रामीण सुविधाओं के लिए किए जा रहे कार्यों का भी उल्लेख किया गया है।
भेजीनारा गांव में पाइपलाइन का कार्य पूरा हो चुका है। वहीं बारिश के दौरान आवागमन की समस्या को देखते हुए सिंघाली माइन गेट से भेजीनारा तक लगभग 200 मीटर हिस्से में अस्थायी सड़क के निर्माण/सुधार का काम किया जा रहा है।
इसी तरह लालपुर गांव में ग्रामीणों के नहाने और दैनिक उपयोग के लिए तालाब का उत्खनन पूरा किया जा चुका है और पचरी निर्माण का कार्य जारी बताया गया है।
इन कार्यों को परियोजना की आवश्यकताओं के साथ स्थानीय सुविधाओं और आवागमन को संतुलित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
बाउंड्रीवाल क्यों? सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सवाल
परियोजना क्षेत्र में बाउंड्रीवाल और सीमांकन का काम भी किया जा रहा है। भविष्य में यहां HEMM सहित भारी मशीनरी का संचालन प्रस्तावित है। ऐसे क्षेत्र में बच्चों और आम नागरिकों का अनियंत्रित आवागमन दुर्घटना का कारण बन सकता है।
इसी वजह से परियोजना प्रबंधन के अनुसार बाउंड्रीवाल और गेट सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं, न कि ग्रामीणों के आवागमन को अनावश्यक रूप से रोकने का माध्यम।
वर्षा समाप्त होने के बाद स्थल परिस्थितियों और प्रशासनिक समन्वय के आधार पर बाईपास अथवा वैकल्पिक मार्ग विकसित किए जाने की बात कही गई है। तब तक दोनों ओर के गेट खुले रखकर आवश्यक ग्रामीण आवागमन की व्यवस्था जारी रखने की बात भी सामने आई है।
‘पुराने रास्ते’ की असली स्थिति दस्तावेज तय करेंगे
स्थानीय स्तर पर जिस मार्ग को वर्षों पुराना मुख्य रास्ता बताया जा रहा है, उसकी वास्तविक वैधानिक स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
इस मामले में अंतिम स्थिति राजस्व अभिलेख, अधिकृत SECL रिकॉर्ड, अधिग्रहण दस्तावेज और सक्षम प्राधिकारी के रिकॉर्ड के आधार पर ही स्पष्ट हो सकती है। ऐसे मामलों में आरोप-प्रत्यारोप के बजाय दस्तावेजी जांच के आधार पर समाधान निकालना अधिक प्रभावी रास्ता माना जा सकता है।
छह एकड़ भूमि को लेकर विवाद ने बढ़ाई चर्चा
परियोजना से जुड़े करीब 6 एकड़ भूमि के उपयोग को लेकर भी विवाद की स्थिति सामने आई है। परियोजना प्रबंधन का आरोप है कि कुछ जनप्रतिनिधियों और लोगों द्वारा निजी हितों से जुड़े मुद्दों को लेकर ग्रामीणों को प्रभावित कर परियोजना के कार्यों में बाधा उत्पन्न की जा रही है।
हालांकि ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। भूमि संबंधी किसी भी दावे का वास्तविक समाधान राजस्व रिकॉर्ड, अधिग्रहण दस्तावेज, SECL के अधिकृत रिकॉर्ड और सक्षम प्राधिकारी के आदेश के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
किसी भी भूमि विवाद के लंबे समय तक लंबित रहने का सीधा असर परियोजना के निर्माण कार्य और निर्धारित समय-सीमा पर पड़ सकता है।
आंदोलन नहीं, दस्तावेज और संवाद से निकले समाधान
परियोजना प्रबंधन का कहना है कि ग्रामीणों की वास्तविक समस्याओं का समाधान प्रशासन और संबंधित पक्षों के साथ बातचीत के माध्यम से किया जा सकता है। प्रबंधन ने संवाद का रास्ता खुला होने की बात कही है।
यही इस पूरे मामले का महत्वपूर्ण पहलू है—तकनीकी विकास जरूरी है, लेकिन विकास के साथ स्थानीय लोगों की सुरक्षा, आवागमन और वास्तविक अधिकारों का समाधान भी उतना ही जरूरी है।
यदि किसी ग्रामीण या पक्ष का कोई वैध दावा है तो उसका परीक्षण दस्तावेजों के आधार पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए। इसी प्रक्रिया से विवाद भी सुलझ सकता है और परियोजना में अनावश्यक रुकावट से भी बचा जा सकता है।
सिंघाली की परियोजना सिर्फ एक खदान की कहानी नहीं
सिंघाली पेस्ट फिल परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसकी सफलता भूमिगत खनन के भविष्य के लिए एक नया तकनीकी अनुभव उपलब्ध करा सकती है।
यदि तकनीक निर्धारित मानकों के अनुरूप सफल रहती है, तो भविष्य में भूमिगत खदानों में सुरक्षा, स्थिरता और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग को लेकर नए विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि परियोजना तकनीकी दक्षता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी, सुरक्षा मानकों और स्थानीय हितों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़े।
अब चुनौती सिर्फ पेस्ट फिल तकनीक को सफल बनाने की नहीं, बल्कि विकास और विश्वास—दोनों को साथ लेकर चलने की है।
सिंघाली की यह परियोजना यदि तय मानकों के अनुसार सफल होती है, तो कोरबा के लिए यह केवल एक नई खनन परियोजना नहीं, बल्कि भूमिगत कोयला खनन में तकनीकी नवाचार की एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकती है। वहीं स्थानीय ग्रामीणों की चिंताओं का पारदर्शी और दस्तावेजी समाधान इस विकास यात्रा को और मजबूत आधार दे सकता है।







