42 जनजातियां, एक मंच और एक संकल्प—आदिवासी एकता की गूंज से हुआ तीन दिवसीय महोत्सव का भव्य समापन
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विश्व की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ कोरबा में अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी मूल निवासी दिवस समारोह का समापन, संस्कृति-संरक्षण के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नशामुक्ति का दिया संदेश
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** कोरबा। विश्व की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ जिला कोरबा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी मूल निवासी दिवस के तीन दिवसीय महोत्सव का 9 अगस्त को भव्य एवं गरिमामय वातावरण में समापन हुआ। तीन दिनों तक चले इस विशाल आयोजन में आदिवासी संस्कृति, परंपरा, सामाजिक एकता, पारंपरिक खेलों और सामाजिक जागरूकता की अद्भुत झलक देखने को मिली। समापन अवसर पर बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए और आयोजन की सुव्यवस्थित व्यवस्थाओं तथा विभिन्न कार्यक्रमों की जमकर सराहना की।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सोनाखान के श्री राजेंद्र सिंह दीवान उपस्थित रहे, जो छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद वीर नारायण सिंह के वंशज हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री बी.एस. पैंकरा ने की। वहीं अति विशिष्ट अतिथि श्री सेवक राम मरावी, जिला अध्यक्ष सर्व समाज कोरबा सहित विभिन्न समाजों एवं 42 जनजातियों के समाज प्रमुख विशेष रूप से उपस्थित रहे।
एक मंच पर 42 जनजातियां, सामाजिक एकता का दिया बड़ा संदेश
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि अलग-अलग जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधि और समाज प्रमुख एक मंच पर एकत्रित हुए। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि परंपराएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन समाज की मूल भावना, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव एक है।
तीन दिवसीय आयोजन में पारंपरिक संस्कृति, सामाजिक जागरूकता, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों सहित विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और विरासत से जोड़ने का प्रयास किया गया। विशाल जनभागीदारी ने इस आयोजन को एक यादगार सामाजिक एवं सांस्कृतिक महोत्सव का रूप प्रदान किया।
संस्कृति बचानी है तो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना होगा

समापन समारोह में अतिथियों ने अपने उद्बोधन में आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य परंपराओं, आदिम सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक खेलों के संरक्षण के साथ शिक्षा के महत्व पर विशेष जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि समाज की सांस्कृतिक विरासत केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पहचान और गौरव का आधार है।
वक्ताओं ने समाज में वैचारिक एवं सामाजिक एकता को मजबूत करने के साथ वर्तमान परिस्थितियों का मूल्यांकन करने की आवश्यकता बताई। समाज के अधिकारी, कर्मचारी, व्यापारी और विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित लोगों से भी सामाजिक विकास में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया गया।
रघुवीर सिंह मार्को ने सामाजिक एकता और वर्तमान चुनौतियों पर रखी बात
शक्तिपीठ के संरक्षक श्री रघुवीर सिंह मार्को ने अपने उद्बोधन में समाज की वर्तमान परिस्थितियों, सामाजिक एकता और भविष्य की चुनौतियों पर व्यापक चर्चा की। उन्होंने समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ आगे बढ़ने और बदलते समय के अनुरूप शिक्षा तथा जागरूकता को प्राथमिकता देने की बात कही।
मोहन सिंह प्रधान बोले—जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, हमारी जीवन संस्कृति हैं
शक्तिपीठ के संरक्षक श्री मोहन सिंह प्रधान ने अपने संबोधन में आदिवासी समाज की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के बेहद करीब रहकर जीवन जीता आया है। जंगल, पहाड़, नदियां और जमीन उनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस दुनिया की सांस्कृतिक विविधता और मूलनिवासी समुदायों की पहचान एवं विरासत के महत्व को सामने लाने का अवसर है। आदिवासी समाज ने सदियों से अपनी परंपराओं, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक जीवन पद्धति को संजोकर रखा है।
उन्होंने कहा कि जल, जंगल, जमीन और पहाड़ों का संरक्षण केवल आदिवासी समाज की जिम्मेदारी नहीं है। प्रकृति ने हर व्यक्ति को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार दिया है, इसलिए पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन प्रत्येक समाज और प्रत्येक व्यक्ति का साझा दायित्व होना चाहिए।
विकास जरूरी, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं
श्री प्रधान ने कहा कि विकास की गति वर्तमान समय की आवश्यकता है, लेकिन विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। यदि प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन इसी तरह चलता रहा तो आने वाले समय में इसका प्रभाव मानव जीवन पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
उन्होंने समाज से प्रकृति के संरक्षण को सामूहिक मिशन बनाने का आह्वान किया। उनका कहना था कि स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी और सुरक्षित पर्यावरण का अधिकार समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य और रोजगार को बनाया जाए प्राथमिकता
समापन अवसर पर शिक्षा को सामाजिक विकास का सबसे मजबूत आधार बताते हुए श्री प्रधान ने कहा कि समाज के अंतिम छोर तक शिक्षा के महत्व को पहुंचाने की जिम्मेदारी समाज को स्वयं उठानी होगी।
उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि समाज यदि एकजुट होकर इन क्षेत्रों में काम करे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।
नशामुक्त समाज के लिए गांव-गांव अभियान तेज करने का आह्वान
समाज में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए नशा उन्मूलन अभियान को और गति देने की आवश्यकता बताई गई। वक्ताओं ने कहा कि गांव-गांव में नशामुक्ति के लिए चलाए जा रहे प्रयासों को और मजबूत करना होगा तथा युवाओं को शिक्षा, खेल, रोजगार और सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना होगा।

पारंपरिक खेलों ने बढ़ाया आयोजन का आकर्षण
तीन दिवसीय महोत्सव में पारंपरिक खेलकूद प्रतियोगिताओं ने विशेष आकर्षण पैदा किया। विभिन्न खेलों में प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। प्रतियोगिताओं के संचालन के लिए बाहर से आए निर्णायक मंडल ने अपनी सेवाएं दीं।
इस अवसर पर श्री अशोक नायक सर, व्याख्याता पीडिया सहित कबड्डी के राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर के रेफरी और निर्णायकों ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। पारंपरिक खेलों के माध्यम से युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत और खेल परंपराओं से जोड़ने का संदेश दिया गया।
आयोजन की सफलता के लिए सभी सहयोगियों का जताया आभार
समापन अवसर पर श्री मोहन सिंह प्रधान ने तीन दिवसीय आयोजन को सफल बनाने में योगदान देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने शक्तिपीठ के संरक्षक मंडल, पदाधिकारियों, युवा प्रकोष्ठ, शंभू शक्ति सेना, जंगो रायतार, मातृशक्ति संघ, समस्त अधिकारी-कर्मचारी संघ, चिकित्सकों, रक्तदान शिविर में सहभागी प्रतिभागियों, भोजन व्यवस्था में लगे सहयोगियों तथा सुरक्षा व्यवस्था में जुटे सभी सदस्यों का धन्यवाद किया।

विशेष रूप से उन्होंने शक्तिपीठ के सांस्कृतिक विभाग एवं सांस्कृतिक प्रमुख श्री रूपेंद्र सिंह पैंकरा और उनकी पूरी टीम के अथक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि दिन-रात मेहनत करने वाले समिति के सदस्यों, निर्णायक मंडल और प्रत्येक सहयोगी के सामूहिक प्रयासों से ही इतना विशाल आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हो सका।
आयोजन ने दिया स्पष्ट संदेश—एकता में ही समाज की शक्ति
विश्व आदिवासी मूल निवासी दिवस के इस तीन दिवसीय महोत्सव ने कोरबा में सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता का मजबूत संदेश दिया। 42 जनजातियों के समाज प्रमुखों और बड़ी संख्या में नागरिकों की सहभागिता ने यह साबित किया कि अपनी संस्कृति, परंपरा और पहचान को सुरक्षित रखते हुए समाज शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक विकास की दिशा में भी मजबूती से आगे बढ़ सकता है।
विश्व की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ में आयोजित यह महोत्सव केवल उत्सव बनकर समाप्त नहीं हुआ, बल्कि सांस्कृतिक विरासत बचाने, प्रकृति की रक्षा करने, शिक्षा को बढ़ावा देने, नशे के खिलाफ समाज को एकजुट करने और आने वाली पीढ़ी के बेहतर भविष्य के लिए सामूहिक संकल्प का संदेश देकर संपन्न हुआ।


