सिकासार-कोदार लिंक परियोजना पर हाईकोर्ट की मुहर: टेंडर प्रक्रिया को वैध ठहराया, याचिका खारिज
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हाईकोर्ट ने कहा– टेंडर शर्तें तय करना सरकार का अधिकार, ठोस आधार के बिना न्यायालय नहीं करेगा हस्तक्षेप; भ्रष्टाचार के आरोपों को नहीं मिला कानूनी समर्थन
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** रायपुर/बिलासपुर छत्तीसगढ़ की बहुचर्चित सिकासार-कोदार लिंक सिंचाई परियोजना से जुड़े टेंडर विवाद में राज्य सरकार को बड़ी कानूनी राहत मिली है। बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जल संसाधन विभाग की निविदा प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि टेंडर प्रक्रिया में न्यायालय केवल असाधारण परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकता है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि निविदा प्रक्रिया मनमानी, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विपरीत थी।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 4 अगस्त 2026 को पारित अपने विस्तृत निर्णय में रिट याचिका (WPC) क्रमांक 4026/2026 को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर्स की याचिका हुई खारिज
यह याचिका एम/एस ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड द्वारा दायर की गई थी। कंपनी ने जल संसाधन विभाग की निविदा शर्तों और उससे संबंधित कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी। मामले में राज्य शासन, जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी तथा दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड भी पक्षकार थे।

सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहा कि निविदा प्रक्रिया में किसी प्रकार की पक्षपातपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या मनमानी कार्रवाई हुई है।
हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि—
टेंडर की पात्रता शर्तें तय करना संबंधित विभाग और निविदा प्राधिकरण का अधिकार है।
विशेषज्ञ टेंडर मूल्यांकन समिति के निर्णय में अदालत अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य प्रशासनिक निर्णयों का स्थान लेना नहीं, बल्कि केवल उनकी वैधानिकता की जांच करना है।
जब तक स्पष्ट रूप से मनमानी, भेदभाव, दुर्भावना या कानून का उल्लंघन सिद्ध न हो, तब तक न्यायालय टेंडर प्रक्रिया में दखल नहीं देगा।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के अनेक महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि टेंडर तैयार करने वाला विभाग अपनी आवश्यकता और व्यावसायिक हितों का सबसे बेहतर आकलन करता है तथा न्यायालय उसकी व्यावसायिक समझ (Commercial Wisdom) का स्थान नहीं ले सकता।
सभी अंतरिम आवेदन भी हुए समाप्त
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए उससे जुड़े सभी अंतरिम आवेदनों का भी निपटारा कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि इस मामले में किसी भी पक्ष पर न्यायालय ने लागत (Cost) नहीं लगाई।
राजनीतिक आरोपों पर भी बढ़ी चर्चा
इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। परियोजना को लेकर पहले लगाए गए विभिन्न भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। हालांकि, अदालत का निर्णय मुख्य रूप से निविदा प्रक्रिया की वैधानिकता और न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे तक सीमित है। न्यायालय ने अपने आदेश में यह माना कि प्रस्तुत मामले में टेंडर प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने योग्य कोई कानूनी आधार स्थापित नहीं किया जा सका।
फैसले का व्यापक महत्व
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सरकारी टेंडरों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर है। इससे यह सिद्धांत और मजबूत हुआ है कि न्यायालय केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करेगा, जहां प्रशासनिक निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाने, पक्षपातपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या विधि-विरुद्ध हों। अन्यथा, सरकारी विभागों द्वारा निर्धारित पात्रता शर्तों और विशेषज्ञ समितियों के तकनीकी निर्णयों का सम्मान किया जाएगा।


