“मौत के गड्ढों पर खामोश जिम्मेदार! रजगामार मेन रोड बना ‘डेथ ट्रैप’, हादसे का इंतजार कर रहे पंचायत और एसईसीएल?”
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त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** रजगामार/कोरबा। ग्राम पंचायत रजगामार की जीवनरेखा कही जाने वाली मेन रोड आज अपनी बदहाली की ऐसी कहानी बयां कर रही है, जिसे देखकर किसी का भी दिल दहल जाए। सड़क पर बने विशाल और पानी से लबालब गहरे गड्ढे अब आम लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। हालत यह है कि रोजाना हजारों लोग, स्कूली बच्चे, नौकरीपेशा कर्मचारी, मजदूर और ग्रामीण अपनी जान हथेली पर रखकर इस सड़क से गुजरने को मजबूर हैं, लेकिन ग्राम पंचायत रजगामार और एसईसीएल के जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सोए हुए हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह सड़क किसी प्राकृतिक आपदा की शिकार नहीं हुई है, बल्कि वर्षों से चली आ रही घोर लापरवाही और जिम्मेदार संस्थाओं की उदासीनता का नतीजा है। बरसात के मौसम में सड़क पर बने गड्ढे पानी से पूरी तरह भर चुके हैं, जिससे यह अंदाजा लगाना तक मुश्किल हो जाता है कि सड़क कहां है और गड्ढा कहां। ऐसे में दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह रास्ता किसी मौत के कुएं से कम नहीं रह गया है।
सबसे गंभीर बात यह है कि इसी मार्ग से बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे और ग्रामीण प्रतिदिन कोरबा शहर आते-जाते हैं। रात के अंधेरे में पानी से भरे इन गड्ढों में वाहन फिसलने और पलटने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या किसी मासूम बच्चे की जान जाने के बाद ही अधिकारियों की नींद खुलेगी?
ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि जनता समय पर टैक्स देती है, वोट देती है और विकास के बड़े-बड़े वादे सुनती है, लेकिन बदले में उन्हें मिली है मौत को दावत देती सड़क। जिम्मेदार विभागों की यह चुप्पी अब सवालों के घेरे में है। आखिर इस सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है? यदि कल कोई बड़ा हादसा होता है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
रजगामार मेन रोड की भयावह स्थिति अब सिर्फ एक सड़क की समस्या नहीं, बल्कि जनसुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बन चुकी है। स्थानीय लोगों ने तत्काल सड़क की मरम्मत कर गड्ढों को भरने तथा दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
जनता का कहना है कि यदि जल्द ही सड़क की मरम्मत नहीं की गई, तो मजबूर होकर ग्रामीण सड़क पर उतरकर आंदोलन करने को विवश होंगे। अब सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जान की सुरक्षा का है।
“जनता पूछ रही है—आखिर कब तक मौत के इन गड्ढों पर गुजरती रहेंगी जिंदगियां?”


