“अंगूठा लगवाकर राशन गायब! दमखांचा में गरीबों के हक पर डाका”



“नशे में सचिव, बेलगाम सरपंच और बेबस जनता—करतला की व्यवस्था पर बड़ा सवाल”
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//**//** कोरबा/करतला।
सरकार भले ही “हर गरीब तक राशन” का दावा कर रही हो, लेकिन करतला विकासखंड के ग्राम पंचायत दमखांचा की जमीनी सच्चाई इन दावों को खुली चुनौती देती नजर आ रही है। यहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) मजाक बनकर रह गई है—जहां गरीबों के हक का राशन या तो रोका जा रहा है या फिर रिकॉर्ड में गड़बड़ी कर गायब किया जा रहा है।
गांव से सामने आई तस्वीरें और ग्रामीणों के आरोप किसी साधारण लापरवाही की कहानी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित गड़बड़ी की ओर इशारा कर रहे हैं। हितग्राहियों का आरोप है कि राशन दुकान में पहले ई-पॉस मशीन पर अंगूठा लगवा लिया जाता है—यानि सिस्टम में वितरण “दिखा” दिया जाता है—लेकिन हकीकत में राशन नहीं दिया जाता। कई दिनों तक चक्कर लगाने के बाद कभी आधा-अधूरा राशन थमा दिया जाता है, तो कभी खाली हाथ लौटा दिया जाता है।
“अंगूठा पहले, राशन बाद में”—गरीबों के साथ खुला छल
गांव की महिला महेतरीन बाई की पीड़ा इस पूरे घोटाले की सच्चाई बयां करती है।
“हम मजदूरी छोड़कर जाते हैं, अंगूठा लगवाते हैं, लेकिन राशन नहीं मिलता। बार-बार जाने को कहा जाता है… आखिर हम कब तक चक्कर लगाएं?”
यह सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं, बल्कि पूरे दमखांचा गांव की हकीकत है।
शांति बाई ने भी गुस्से में कहा—
“महीनों से शक्कर और चना बंद है। चावल भी पूरा नहीं मिलता। क्या गरीबों का हक ऐसे ही छीना जाएगा?”
नशे में सचिव, मनमानी का राज
ग्रामीणों ने पंचायत सचिव पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि सचिव अक्सर शराब के नशे में कार्यालय पहुंचते हैं और उसी हालत में राशन वितरण जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी निभाते हैं।

चावल वितरण के दौरान उनका व्यवहार संदिग्ध और गैर-जिम्मेदाराना बताया गया है, जिससे साफ है कि यहां नियम नहीं, बल्कि मनमानी चल रही है।
पत्रकारों से बदसलूकी—सच छुपाने की कोशिश?
जब इस पूरे मामले की पड़ताल करने पत्रकार गांव पहुंचे, तो पंचायत के जिम्मेदार प्रतिनिधियों का असली चेहरा सामने आ गया।
सरपंच और सचिव ने खुलेआम अभद्रता की, गाली-गलौज की और जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया।
सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि एक महिला पत्रकार के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया—जो न सिर्फ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अपमान है, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।
“जो छापना है छाप लो”—सचिव का खुला चैलेंज
पंचायत सचिव का यह बयान—
“जो छापना है छाप लो, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता”
यह बताने के लिए काफी है कि उन्हें किसी कार्रवाई का डर नहीं है। यह बयान प्रशासनिक व्यवस्था को खुली चुनौती है और इस बात का संकेत भी कि कहीं न कहीं उन्हें किसी बड़े संरक्षण का भरोसा है।
प्रशासन भी मौन—कार्रवाई से पहले ‘कागजी बहाना’
जब जनपद पंचायत करतला के सीईओ को इस गंभीर मामले की जानकारी दी गई, तो तत्काल कार्रवाई की बजाय उन्होंने “पहले लिखित शिकायत करो” कहकर पल्ला झाड़ लिया।
सवाल यह उठता है कि जब जमीनी स्तर पर गड़बड़ी साफ दिख रही है, तो क्या कार्रवाई के लिए सिर्फ कागजी औपचारिकताएं ही जरूरी हैं?
सुशासन के दावे बनाम दमखांचा की हकीकत
प्रदेश में सुशासन, पारदर्शिता और जनकल्याण के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन दमखांचा पंचायत की यह तस्वीर उन दावों को आईना दिखा रही है।
यहां गरीबों का हक छीना जा रहा है, जिम्मेदार अधिकारी बेलगाम हैं, और शिकायत करने पर भी कार्रवाई नहीं हो रही।
अब सवाल सीधा है…
क्या गरीबों के राशन की लूट पर कार्रवाई होगी?
क्या नशे में ड्यूटी करने वाले सचिव पर सख्त कदम उठेगा?
क्या पत्रकारों से बदसलूकी करने वालों पर मामला दर्ज होगा?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
दमखांचा की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की पोल खोलती है जहां जिम्मेदारी की जगह मनमानी और जवाबदेही की जगह बेपरवाही ने ले ली है।
अब देखना यह है कि प्रशासन जागता है… या फिर गरीबों का हक यूं ही लुटता रहेगा।


