February 23, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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अनाथ चार बेटियां दर-दर, फाइलों में दबी इंसाफ की पुकार: पांच साल से राहत राशि का इंतजार, जिम्मेदार कौन?

 

त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//** कोरबा। सिस्टम की बेरुखी और लापरवाही की मार झेल रहीं चार मासूम बेटियों की कहानी दिल दहला देने वाली है। पहले पिता का साया सिर से उठा, फिर प्रकृति के कहर ने मां को भी छीन लिया। आज सिम्मी, स्नेहा, मुस्कान और आस्था—ये चारों बहनें—दाने-दाने को मोहताज हैं और सरकारी मदद की आस में भटक रही हैं। सवाल यह है कि आखिर पांच साल तक राहत राशि की फाइलें क्यों धूल फांकती रहीं?

 

 

मूल रूप से सीतामढ़ी निवासी कलिन्द्री यादव के परिवार पर विपत्ति का पहाड़ तब टूटा जब पति की मृत्यु के बाद वे मजदूरी कर चारों बच्चियों का पालन-पोषण कर रही थीं। 1 अप्रैल 2018 को आए भीषण आंधी-तूफान में घर का छज्जा गिरने से दबकर उनकी भी मौत हो गई। एक ही झटके में चारों नाबालिग बच्चियां पूरी तरह अनाथ हो गईं।
इतनी बड़ी त्रासदी के बाद शासन की ओर से आपदा राहत राशि मिलना उनका अधिकार था, लेकिन यही अधिकार अब तक कागजों में उलझा हुआ है। पीड़ित बच्चियों के अनुसार, राहत राशि दिलाने के नाम पर एक वकील के माध्यम से प्रक्रिया शुरू कराई गई, पर तीन वर्षों तक मामला लटका रहा। नतीजा—न राहत मिली, न सहारा।
चार साल तक इंतजार करने के बाद जब कहीं से कोई मदद नहीं मिली तो बेटियों ने साहस जुटाकर कोरबा कलेक्टर से मुलाकात की और अपना दुख-दर्द बयान किया। कलेक्टर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। बताया जा रहा है कि अब पुरानी फाइल दोबारा खोली गई है।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—अगर यह मामला 2018 का है, तो पांच साल तक जिम्मेदार विभाग क्या करता रहा? क्या अनाथ बच्चियों की पुकार सुनने वाला कोई नहीं था? आपदा राहत जैसी संवेदनशील व्यवस्था में देरी क्या केवल प्रशासनिक भूल है या मानवीय संवेदनाओं की कमी?
स्थानीय लोगों में भी इस मामले को लेकर आक्रोश है। उनका कहना है कि जिन अधिकारियों और संबंधित पक्षों की लापरवाही से यह मामला वर्षों तक लंबित रहा, उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। राहत राशि केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उन बच्चियों के भविष्य की आधारशिला है।
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। क्या इस बार फाइलों से निकलकर मदद सचमुच इन मासूमों तक पहुंचेगी, या फिर एक और आश्वासन उनके हिस्से आएगा? कोरबा की इन चार बेटियों की जिंदगी का फैसला अब सिस्टम की संवेदनशीलता और तत्परता पर निर्भर है।

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