शिकायतों पर पर्दा, अफसरों को संरक्षण और एक जवान टूट गया कोरबा नगर सेना मामला: प्रशासनिक निष्क्रियता ने पैदा किया विस्फोट, अब हर सवाल सिस्टम से






त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//*कोरबा जिले में नगर सेना (होमगार्ड) से जुड़ा मामला अब किसी एक जवान की पीड़ा तक सीमित नहीं रहा। यह प्रकरण प्रशासनिक संवेदनहीनता, चेतावनियों की अनदेखी और जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने की प्रवृत्ति का भयावह उदाहरण बन चुका है। जिस घटना ने पूरे जिले को झकझोर दिया, वह अचानक नहीं हुई—यह लंबे समय से सुलग रही आग का विस्फोट थी।
बर्खास्तगी से आहत नगर सेना के जवान संतोष पटेल द्वारा उठाया गया आत्मघाती कदम सीधे-सीधे यह सवाल करता है कि
जब विभाग के भीतर लगातार असंतोष था, जब गंभीर आरोप सामने आ चुके थे, तब प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं किया?
⚠️ संकेत थे, शिकायतें थीं, फिर भी चुप्पी क्यों?
यह अब किसी से छिपा नहीं है कि जिला सेनानी अनुज एक्का के खिलाफ इससे पहले भी मानसिक प्रताड़ना और दुर्व्यवहार के आरोप लग चुके थे। महिला नगर सैनिकों द्वारा किया गया विरोध, धरना और शिकायतें प्रशासनिक रिकॉर्ड का हिस्सा थीं।
इसके बावजूद न तो निष्पक्ष जांच हुई, न ही जिम्मेदारी तय की गई।
क्या यह लापरवाही थी या जानबूझकर किया गया संरक्षण?
और अगर यह सब पहले ही सामने था, तो फिर एक जवान को टूटने के लिए क्यों छोड़ दिया गया?
🧩 ‘विभागीय मामला’ कहकर दबा दी गई पीड़ा
सूत्रों के अनुसार पीड़ित जवान लगातार मानसिक दबाव में था। उसकी शिकायतें ऊपर तक पहुँचीं, लेकिन हर बार उन्हें “आंतरिक मामला” बताकर नजरअंदाज कर दिया गया।
यही वह प्रशासनिक रवैया था जिसने एक वर्दीधारी जवान को यह महसूस करा दिया कि
सिस्टम में उसकी सुनवाई के लिए कोई जगह नहीं बची।
यह सवाल अब प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि—
जब एक जवान बार-बार मदद की गुहार लगा रहा था, तब अधिकारी और जिम्मेदार तंत्र कहाँ थे?
🏥 इलाज जारी, लेकिन सिस्टम अब भी कटघरे में
पीड़ित जवान का इलाज जारी है, लेकिन इससे भी ज्यादा नाजुक स्थिति प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी की है।
आज भी कई सवाल अनुत्तरित हैं—
पहले हुए आंदोलनों को हल्के में क्यों लिया गया?
बार-बार सामने आए आरोपों के बाद भी अधिकारी पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या प्रशासन तब ही जागता है, जब हालात बेकाबू हो जाते हैं?
✊ जवानों का उबाल: अब भरोसे की सीमा टूट चुकी
घटना के बाद नगर सेना के जवानों का फूट पड़ा आक्रोश इस बात का साफ संकेत है कि विभाग के भीतर असंतोष अब चरम पर है।
हाथों में तख्तियां, आंखों में गुस्सा और आवाज़ में दर्द—जवानों ने साफ कह दिया है कि
अब ‘सब ठीक है’ का दिखावा नहीं चलेगा।
पीड़ित जवान की बहाली, दोषियों के खिलाफ एफआईआर और जिम्मेदारी तय करने की मांग के साथ यह चेतावनी भी दी गई है कि
जब तक न्याय नहीं मिलेगा, आंदोलन थमेगा नहीं।
🗣️ राजनीतिक दखल के बाद बढ़ा दबाव
पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल द्वारा धरने पर पहुँचकर जवानों का समर्थन करना इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल विभागीय नहीं रहा।
अब यह प्रशासनिक जवाबदेही बनाम सत्ता की चुप्पी का सवाल बन चुका है।
❗ सबसे बड़ा और सबसे कड़वा सवाल
अगर पहले की शिकायतों पर ईमानदारी से कार्रवाई होती,
अगर अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जाती,
तो क्या आज एक जवान को इस हद तक टूटना पड़ता?
आज की कार्रवाई सुधार है या सिर्फ हालात संभालने की कोशिश—
यह फैसला अब जनता और समय दोनों करेंगे।





