लाखों की पानी टंकी अधूरी, फुलझर के ग्रामीणों की प्यास पर सरकारी तंत्र मौन! नल-जल योजना के दावों की खुली पोल
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करोड़ों की योजनाओं के दावों के बीच फुलझर में लाखों की लागत से बन रही पानी टंकी आज भी अधूरी; आखिर किसकी जवाबदेही तय करेगा प्रशासन? निर्माण एजेंसी से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों तक उठे सवाल
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// करतला (कोरबा)। सरकार गांव-गांव तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने और हर घर तक नल से पानी उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे कर रही है। नल-जल योजना के माध्यम से ग्रामीणों की पेयजल समस्या दूर करने के लिए सरकारी खजाने से लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन कोरबा जिले के करतला विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत फुलझर की स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यहां लाखों रुपये की लागत से निर्मित की जा रही पानी टंकी आज भी अधूरी पड़ी है और ग्रामीणों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
निर्माण शुरू हुआ, लेकिन पूरा कराने की जिम्मेदारी किसकी?
गांव में पानी टंकी का अधूरा निर्माण सरकारी कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहा है। तस्वीरों में निर्माण कार्य अधूरा दिखाई दे रहा है। जिस टंकी से ग्रामीणों के घरों तक पानी पहुंचना था, वही टंकी अब तक पूरी नहीं हो सकी है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर निर्माण कार्य को समय-सीमा में पूरा कराने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या निर्माण एजेंसी ने निर्धारित समय में काम पूरा नहीं किया? यदि ऐसा है तो संबंधित विभाग ने अब तक क्या कार्रवाई की?
अधिकारियों की निगरानी कहां गई?
इस पूरे मामले में केवल निर्माण एजेंसी ही नहीं, बल्कि संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि निर्माण कार्य लंबे समय से अधूरा है, तो क्या विभागीय अधिकारियों ने स्थल निरीक्षण किया? क्या निर्माण की प्रगति की समीक्षा हुई? क्या उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई? यदि जानकारी थी तो अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के संबंधित कार्यपालन अभियंता, अनुविभागीय अधिकारी और उप अभियंता से यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि फुलझर की पानी टंकी का निर्माण किस एजेंसी को सौंपा गया था, इसकी स्वीकृत लागत कितनी है, कार्य पूर्णता की निर्धारित समय-सीमा क्या थी और अब तक कितना काम पूरा हुआ है।
ग्राम पंचायत की भूमिका भी जांच के दायरे में
ग्राम पंचायत के जिम्मेदार प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि गांव की पेयजल समस्या को लेकर अब तक क्या प्रयास किए गए हैं। क्या अधूरे निर्माण की जानकारी विभाग को लिखित रूप में दी गई? क्या ग्रामीणों की शिकायतों को उच्च स्तर तक पहुंचाया गया? यदि समस्या लंबे समय से बनी हुई है तो उसके समाधान के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए?
जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी धन के उपयोग और जवाबदेही का है। जब किसी योजना के लिए बजट स्वीकृत होता है, निर्माण कार्य शुरू होता है और सरकारी रिकॉर्ड में प्रगति दर्ज की जाती है, तो उसकी गुणवत्ता, समय-सीमा और उपयोगिता सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी होती है। अधूरी टंकी पर खर्च हुई राशि, अब तक हुए निर्माण की गुणवत्ता और भुगतान की स्थिति की भी जांच होनी चाहिए।
ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर उन्हें नल से पानी कब मिलेगा? क्या उन्हें हर बार केवल आश्वासन ही मिलता रहेगा? सरकारी योजनाओं का उद्देश्य कागजों पर उपलब्धि दर्ज करना नहीं, बल्कि लोगों को वास्तविक सुविधा देना है।
अब प्रशासन से सीधे सवाल
क्या कलेक्टर इस मामले में संज्ञान लेकर जांच के निर्देश देंगे? क्या जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी संबंधित विभाग से जवाब तलब करेंगे? क्या लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन अभियंता निर्माण की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करेंगे? क्या निर्माण एजेंसी की जवाबदेही तय होगी? और सबसे बड़ा सवाल—फुलझर के ग्रामीणों को नल-जल योजना का लाभ आखिर कब मिलेगा?
अब आवश्यकता केवल आश्वासन की नहीं, बल्कि मौके पर जांच, निर्माण की गुणवत्ता का परीक्षण, स्वीकृत राशि एवं भुगतान का ब्यौरा सार्वजनिक करने और अधूरे कार्य को शीघ्र पूरा कराने की है। फुलझर के ग्रामीणों को भी स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होना चाहिए। सरकारी योजना का लाभ कागजों में नहीं, गांव के हर घर तक पहुंचना चाहिए।
