एसआईआर की पारदर्शी प्रक्रिया से कांग्रेस में मची बेचैनी, हार की हताशा में संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावर हुई पार्टी : संतोष पाण्डेय
भाजपा मुख्य प्रदेश प्रवक्ता एवं सांसद ने कांग्रेस को घेरा, पूछा– फर्जी वोटरों के सहारे कितने चुनाव जीते? रामलीला मैदान का प्रदर्शन लोकतंत्र की चिंता नहीं, राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कवायद
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// रायपुर। लगातार चुनावी पराजय से जूझ रही कांग्रेस अब अपनी राजनीतिक विफलताओं का ठीकरा संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ने में जुट गई है। निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी एसआईआर को लेकर कांग्रेस की बयानबाजी पर भाजपा के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता एवं सांसद संतोष पाण्डेय ने जोरदार पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि जनता के जनादेश को स्वीकार करने के बजाय कांग्रेस अब लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है। चुनाव में हार मिलने पर कभी ईवीएम तो कभी मतदाता सूची पर सवाल उठाना कांग्रेस की राजनीतिक आदत बन चुकी है।
संतोष पाण्डेय ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए सवाल किया कि एसआईआर पर सवाल उठाने वाले पहले यह बताएं कि फर्जी और दोहरे मतदाताओं के दम पर कांग्रेस ने कितने चुनाव जीते? उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण कोई राजनीतिक कार्रवाई नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने वाली नियमित और वैधानिक प्रक्रिया है। मृत, स्थानांतरित और दोहरे मतदाताओं के नाम नियमानुसार जांच के बाद हटाए जाते हैं। ऐसे में इस प्रक्रिया का विरोध करने के पीछे कांग्रेस की असली चिंता क्या है, यह जनता समझ रही है।
भाजपा सांसद ने दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के प्रस्तावित प्रदर्शन पर तंज कसते हुए कहा कि यह लोकतंत्र बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक साख और अस्तित्व बचाने का प्रयास है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई ठोस उपलब्धि या सकारात्मक एजेंडा नहीं है। यही कारण है कि राहुल गांधी और प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व मुद्दों के बजाय आरोपों और राजनीतिक नारों के सहारे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में लगे हैं।
संसद में विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पाण्डेय ने कहा कि सदन में चर्चा और सार्थक बहस करने के बजाय विपक्षी सांसद व्यवधान पैदा करते हैं और फिर बाहर आकर समानांतर संसद जैसा राजनीतिक प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने कांग्रेस की राजनीति की तुलना पूर्ववर्ती दौर में बस्तर में समानांतर सत्ता चलाने वाली व्यवस्था से करते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
छत्तीसगढ़ राज्योत्सव से कांग्रेस नेताओं की दूरी और दिल्ली में प्रदर्शन को लेकर भी पाण्डेय ने कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रदेश की संस्कृति, अस्मिता और गौरव की कांग्रेस नेता बात करते हैं, उसी प्रदेश के स्थापना दिवस के उत्सव से दूरी बनाकर दिल्ली में राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन करना उनके दोहरे रवैये को उजागर करता है। कांग्रेस का छत्तीसगढ़िया प्रेम केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार दिखाई देता है। प्रदेश की खुशियों और उपलब्धियों से उसे कोई सरोकार नहीं है।
भाजपा सांसद ने कांग्रेस को वर्ष 1975 के आपातकाल की याद दिलाते हुए कहा कि लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देने वाली कांग्रेस का इतिहास ही संवैधानिक मूल्यों के उल्लंघन से जुड़ा रहा है। जिस पार्टी ने देश पर आपातकाल थोपा, नागरिक अधिकारों को सीमित किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था को संकट में डाला, उसे आज संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उपदेश देने का नैतिक अधिकार नहीं है।
पाण्डेय ने पूर्ववर्ती भूपेश बघेल सरकार पर भी निशाना साधते हुए कोल लेवी, शराब, पीएससी और डीएमएफ से जुड़े कथित घोटालों का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासनकाल में गरीबों, युवाओं और आदिवासियों के हित प्रभावित हुए। इसके विपरीत मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार महतारी वंदन योजना के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक सहायता दे रही है, 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी कर रही है और युवाओं के लिए पारदर्शी रोजगार व्यवस्था को आगे बढ़ा रही है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को भाजपा सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और जनता के बीच बढ़ते विश्वास से परेशानी है। राहुल गांधी के नेतृत्व में दिल्ली में जुटने वाला कांग्रेस का जमावड़ा प्रदेश की अस्मिता की आवाज नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने की कवायद है।
अंत में संतोष पाण्डेय ने कहा कि छत्तीसगढ़ की जागरूक जनता अब आरोपों की राजनीति और वास्तविक जनसेवा के बीच अंतर समझ चुकी है। कांग्रेस चाहे जितने प्रदर्शन करे और कितने ही आरोप लगाए, लोकतांत्रिक संस्थाओं को बदनाम करने से उसकी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस नहीं मिलने वाली। जनता का विश्वास भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि काम और जवाबदेही से हासिल होता है।
