आत्मानंद स्कूल के विकास के नाम पर 1.32 करोड़ की मंजूरी, जमीन पर काम नहीं मिलने का आरोप; 9 के खिलाफ FIR
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DMF राशि के कथित फर्जीवाड़े में तत्कालीन जनपद CEO समेत अधिकारी और निजी पक्ष जांच के घेरे में, न्यायालय के आदेश पर मणिपुर पुलिस ने दर्ज किया मामला
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// अम्बिकापुर। विद्यार्थियों के बेहतर शैक्षणिक वातावरण और विद्यालय परिसर के विकास के लिए स्वीकृत सरकारी राशि के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सरगुजा जिले के केशवपुर स्थित शासकीय स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) मद से स्वीकृत विकास कार्यों में कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। मामले में तत्कालीन जनपद पंचायत अम्बिकापुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सहित नौ आरोपियों के खिलाफ न्यायालय के आदेश पर मणिपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि विकास कार्यों के नाम पर दस्तावेज तैयार कर भुगतान कराया गया, जबकि जांच के दौरान मौके पर स्वीकृत निर्माण कार्य नहीं मिले।
तीन विकास कार्यों के लिए 1.32 करोड़ रुपये की स्वीकृति, लेकिन काम कहां गया?
प्राप्त विवरण के अनुसार, विद्यालय परिसर में तीन अलग-अलग विकास कार्यों के लिए कुल 1 करोड़ 32 लाख 33 हजार रुपये स्वीकृत किए गए थे। इनमें गार्डन सौंदर्यीकरण और सीसी रोड निर्माण के लिए 33 लाख 24 हजार रुपये, प्रधान पाठक कक्ष, प्रसाधन एवं अहाता निर्माण के लिए 49 लाख 57 हजार रुपये तथा प्रवेश द्वार और पार्किंग शेड निर्माण के लिए 49 लाख 52 हजार रुपये निर्धारित किए गए थे।
इतनी बड़ी राशि से विद्यालय परिसर की सूरत बदलने और विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं मिलने की उम्मीद थी। लेकिन जांच में निर्माण कार्य मौके पर नहीं मिलने संबंधी आरोपों ने पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जांच का प्रमुख विषय यही है कि स्वीकृत राशि का भुगतान किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ और निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति क्या थी।
फर्जी आईडी, बिल-वाउचर और मूल्यांकन रिपोर्ट का आरोप
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जेम (GeM) पोर्टल पर कथित फर्जी आईडी तैयार की गई और प्रशासकीय स्वीकृति, निविदा तथा निर्धारित प्रक्रिया से जुड़े नियमों का पालन किए बिना बिल-वाउचर एवं मूल्यांकन प्रतिवेदन तैयार किए गए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर 1 अगस्त 2023 को मेसर्स स्मृति कंस्ट्रक्शन के पक्ष में आरटीजीएस के माध्यम से 48 लाख 36 हजार 544 रुपये का भुगतान किए जाने की बात सामने आई है।
यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल दस्तावेजी अनियमितता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी धन के उपयोग, भुगतान प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की गंभीर जांच का विषय बनेगा। हालांकि, आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस की विवेचना और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगी।
कलेक्टर की जांच में सामने आया अहम तथ्य
मामले में जिला प्रशासन द्वारा गठित जांच दल ने 7 अक्टूबर 2024 को स्थल निरीक्षण कर भौतिक सत्यापन किया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, जांच के दौरान मौके पर स्वीकृत निर्माण कार्य दिखाई नहीं देने की बात दर्ज की गई। इसी तथ्य ने भुगतान प्रक्रिया और प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े किए।
अब यह जांचना महत्वपूर्ण होगा कि कार्यों के नाम पर तैयार अभिलेखों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया, भुगतान की अनुशंसा किसने की और संबंधित प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों तथा निजी पक्षों की क्या भूमिका रही।
न्यायालय के आदेश पर दर्ज हुई FIR
अम्बिकापुर निवासी अभय नारायण पाण्डेय की ओर से अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया गया था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, न्यायाधीश गुलापन राम यादव ने 8 अक्टूबर 2026 को मणिपुर थाना प्रभारी को मामला दर्ज कर निष्पक्ष विवेचना करने का निर्देश दिया। इसके बाद पुलिस ने 24 अक्टूबर 2026 को अपराध क्रमांक 180/2026 के तहत प्राथमिकी दर्ज की।
प्रकरण में भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468, 471, 201, 120-बी और 34 का उल्लेख किया गया है। इन धाराओं में आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, दस्तावेजों की कूटरचना, साक्ष्य छिपाने और आपराधिक षड्यंत्र जैसे आरोपों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
तत्कालीन CEO समेत नौ आरोपी नामजद
इस मामले में नामजद आरोपियों में तत्कालीन जनपद पंचायत अम्बिकापुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सुरेश्वर नाथ तिवारी के अलावा विवेक प्रताप सिंह राठौर, उपेन्द्र सिंह सेंगर, शैलेन्द्र मिश्रा, राम प्रकाश यादव, इम्तियाज सिंह, सुयश अग्रवाल, अरविंद कुमार अग्रवाल और मेसर्स स्मृति कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रेक्टर एंड सप्लायर्स शामिल हैं।
पुलिस ने मामले में आगे की विवेचना शुरू कर दी है। आरोपियों की भूमिका, भुगतान से जुड़े दस्तावेजों, पोर्टल पर दर्ज विवरण और निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति की जांच इस प्रकरण में महत्वपूर्ण होगी। प्राथमिकी में नाम आने का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है; आरोपों की पुष्टि साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगी।
अब जांच में सामने आने चाहिए इन सवालों के जवाब
विद्यालय विकास के लिए स्वीकृत राशि का उपयोग किन कार्यों में हुआ? भुगतान से पहले दस्तावेजों का सत्यापन किसने किया? कथित तौर पर निर्माण कार्य नहीं मिलने के बावजूद भुगतान की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई? और इस पूरे मामले में प्रत्येक संबंधित अधिकारी तथा निजी पक्ष की वास्तविक भूमिका क्या रही?
इन सवालों का जवाब निष्पक्ष और समयबद्ध जांच से ही मिल सकेगा। सरकारी धन का उद्देश्य जनहित और विद्यार्थियों को सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है, तो साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय हो और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
