3 दिन का अल्टीमेटम खत्म, फिर भी SECL का क्वार्टर खाली नहीं!
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नोटिस के बाद भी कब्जा बरकरार—SECL गेवरा में नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं या पर्दे के पीछे चल रहा है कोई खेल?
क्वार्टर B1/77 पर सवालों का पहाड़: आखिर इतने दिनों से बाहरी व्यक्ति क्यों जमा है? क्या कंपनी की कार्रवाई सिर्फ नोटिस तक सीमित है?
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//**// गेवरा/कोरबा। SECL गेवरा क्षेत्र की आवासीय कॉलोनियों में अनधिकृत कब्जे को लेकर अब प्रबंधन की कार्रवाई ही सवालों के घेरे में आ गई है। ऊर्जा नगर स्थित क्वार्टर नंबर B1/77 में बिना वैध आवंटन के रह रहे बाहरी व्यक्ति महेंद्र सिंह को SECL के कार्मिक मानव संसाधन विभाग ने बाकायदा कारण बताओ नोटिस जारी किया था। नोटिस में तीन दिनों के भीतर जवाब देने और वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने का स्पष्ट अवसर दिया गया था।
इतना ही नहीं, नोटिस में यह भी स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि निर्धारित समय में जवाब नहीं देने अथवा जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाने की स्थिति में बिना अग्रिम सूचना बेदखली की कार्रवाई की जाएगी तथा अनधिकृत कब्जे की अवधि के लिए नियमानुसार दंडात्मक शुल्क और हर्जाना भी वसूला जाएगा।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
तीन दिन की मियाद खत्म होने के बाद भी क्वार्टर खाली क्यों नहीं हुआ?
नोटिस जारी हुआ, अल्टीमेटम दिया गया… फिर कार्रवाई कहां अटक गई?
SECL गेवरा क्षेत्र के पत्र क्रमांक SECL/MP/Gevra Area/Personnel/2026/1340 में संबंधित व्यक्ति के कंपनी कर्मचारी नहीं होने तथा बिना वैध आवंटन अथवा सक्षम अधिकारी की अनुमति के क्वार्टर में रहने का उल्लेख किया गया है।
जब प्रबंधन को कथित अनधिकृत कब्जे की जानकारी थी, नोटिस भी जारी कर दिया गया और समय-सीमा भी निर्धारित कर दी गई, तो फिर उसके बाद कार्रवाई में देरी क्यों?
क्या संबंधित विभाग ने तीन दिन बाद मौके का निरीक्षण किया?
क्या क्वार्टर खाली कराने का आदेश जारी हुआ?
यदि आदेश जारी हुआ तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ?
और यदि आदेश जारी नहीं हुआ तो आखिर क्यों?
यही सवाल अब SECL प्रबंधन से जवाब मांग रहे हैं।
कब्जा इतना मजबूत कि नोटिस भी बेअसर?
SECL की कॉलोनियां कंपनी के कर्मचारियों और अधिकृत आवंटियों के लिए हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति बिना वैध आवंटन के लंबे समय से किसी क्वार्टर में रह रहा है, तो यह सिर्फ एक आवास पर कब्जे का मामला नहीं, बल्कि कंपनी की पूरी आवासीय व्यवस्था और नियमों की प्रभावशीलता पर सवाल है।
सबसे गंभीर बात यह है कि जब कंपनी खुद लिखित रूप से कार्रवाई की चेतावनी दे चुकी है, तब भी कथित कब्जा बरकरार रहने की स्थिति में आम लोगों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कार्रवाई रोकने या टलने की वजह क्या है?
क्या मामला किसी अतिरिक्त प्रशासनिक प्रक्रिया में अटका है?
क्या संबंधित व्यक्ति ने कोई दस्तावेज प्रस्तुत किया है?
क्या उसे किसी स्तर से अस्थायी अनुमति मिली है?
क्या क्वार्टर का कोई किराया अथवा अन्य शुल्क कंपनी के खाते में जमा हो रहा है?
अगर हां, तो किस नियम के तहत?
और अगर नहीं, तो फिर इतने दिनों से क्वार्टर खाली क्यों नहीं कराया गया?
‘सेटिंग’ और लेन-देन की चर्चा—SECL स्पष्ट करे, सच क्या है?
किसी भी अधिकारी, कर्मचारी या संबंधित व्यक्ति के बीच लेन-देन, मिलीभगत अथवा संरक्षण का आरोप बिना ठोस प्रमाण के लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन जिस तरह नोटिस की समय-सीमा बीतने के बाद भी कब्जा बरकरार रहने की बात सामने आ रही है, उससे संभावित संरक्षण और अंदरूनी हस्तक्षेप को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश के कारण कार्रवाई रुकी है?
क्या किसी स्तर पर मौखिक सहमति देकर मामला टाला जा रहा है?
क्या कब्जाधारी से कोई शुल्क लिया जा रहा है?
क्या किसी कर्मचारी या अधिकारी की जानकारी में यह व्यक्ति क्वार्टर में रह रहा है?
SECL को इन सवालों पर चुप्पी तोड़नी चाहिए।
क्योंकि यदि वास्तव में कोई वैध प्रक्रिया चल रही है, तो उसे स्पष्ट करने में प्रबंधन को परेशानी नहीं होनी चाहिए। और यदि कोई वैध अनुमति नहीं है, तो फिर बेदखली की कार्रवाई में देरी का कारण भी सार्वजनिक होना चाहिए।
कागजों में सख्ती, जमीन पर ढिलाई?
SECL प्रबंधन द्वारा अनधिकृत कब्जों के खिलाफ समय-समय पर सख्ती की बात कही जाती है। लेकिन यदि एक मामले में नोटिस जारी होने, जवाब के लिए तीन दिन का समय दिए जाने और बेदखली की चेतावनी के बावजूद क्वार्टर खाली नहीं होता, तो सवाल उठेगा ही कि—
क्या SECL के नियम केवल कागजों पर लागू होते हैं?
क्या आम कर्मचारी के मामले में भी इतनी ही लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती?
क्या किसी सामान्य कर्मचारी या सेवानिवृत्त कर्मचारी द्वारा आवास खाली करने में देरी होने पर भी प्रबंधन इतनी ही नरमी बरतता?
अगर नहीं, तो B1/77 मामले में अलग रुख क्यों?
अब SECL प्रबंधन को देना होगा स्पष्ट जवाब
मामला अब सिर्फ क्वार्टर नंबर B1/77 का नहीं है। मामला SECL की प्रशासनिक सख्ती, आवासीय नियमों और कार्रवाई की विश्वसनीयता का है।
SECL गेवरा प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि—
तीन दिन की समय-सीमा समाप्त होने के बाद क्या कार्रवाई की गई?
क्या संबंधित व्यक्ति ने नोटिस का जवाब दिया?
क्या कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत किया गया?
क्या क्वार्टर खाली कराने का आदेश जारी हुआ?
यदि आदेश जारी हुआ तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ?
क्या क्वार्टर के एवज में कोई किराया अथवा अन्य शुल्क लिया जा रहा है?
यदि लिया जा रहा है तो किस नियम के तहत?
संबंधित व्यक्ति को क्वार्टर में रहने की अनुमति किस आधार पर मिली?
क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी की अनुशंसा अथवा अनुमति इसमें शामिल है?
और यदि कोई वैध अनुमति नहीं है तो अब तक बेदखली क्यों नहीं हुई?
सबसे बड़ा सवाल यही—आखिर B1/77 पर किसकी मेहरबानी?
यदि कब्जा अनधिकृत है तो क्वार्टर खाली कराने में इतनी देरी क्यों?
यदि कब्जा वैध है तो वैध दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
यदि कोई शुल्क लिया जा रहा है तो उसका नियम क्या है?
और यदि कोई अनुमति नहीं है तो कंपनी की कार्रवाई आखिर अटकी कहां है?
तीन दिन का अल्टीमेटम खत्म हो चुका है। अब जनता और कर्मचारियों की नजर SECL प्रबंधन के अगले कदम पर है।
नोटिस जारी करने से आगे बढ़कर कार्रवाई कब होगी—या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
SECL प्रबंधन की ओर से इस मामले में आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि देरी के पीछे वास्तविक प्रशासनिक कारण क्या है और क्या किसी स्तर पर कोई विशेष अनुमति अथवा हस्तक्षेप हुआ है।







