श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी पर बन रहा विशेष संयोग, 24 अगस्त को रखा जाएगा व्रत
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व्युंजलि महाद्वादशी के संयोग में पुत्रदा एकादशी का व्रत विशेष फलदायी, 25 अगस्त को होगा पारण
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//** कोरबा। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष पुत्रदा एकादशी पर विशेष धार्मिक संयोग बन रहा है, जिसके कारण व्रत की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्सुकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस बार “व्युंजलि महाद्वादशी” का विशेष संयोग बनने के कारण पुत्रदा एकादशी का व्रत 24 अगस्त 2026, सोमवार को रखने की बात कही गई है।
नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा के अनुसार श्रावण शुक्ल एकादशी तिथि 23 अगस्त 2026 रविवार को रात्रि 2 बजकर 15 मिनट से प्रारंभ होकर 24 अगस्त 2026 सोमवार को प्रातः 4 बजकर 47 मिनट तक रहेगी। इस विशेष तिथि-विचार में महाद्वादशी के संयोग को महत्वपूर्ण माना गया है।
क्या है व्युंजलि महाद्वादशी का संयोग?
धार्मिक पंचांग परंपरा के अनुसार जब एकादशी तिथि द्वादशी तक विस्तारित न हो और द्वादशी तिथि त्रयोदशी तक विस्तारित हो, तब विशेष महाद्वादशी का संयोग माना जाता है। शास्त्रीय मान्यताओं में ऐसे अवसर पर एकादशी के स्थान पर महाद्वादशी का व्रत करने का विधान बताया गया है।
इसी आधार पर इस वर्ष पुत्रदा एकादशी का व्रत 24 अगस्त सोमवार को करने की सलाह दी गई है। धार्मिक मान्यता है कि महाद्वादशी के इस विशेष संयोग में व्रत एवं भगवान विष्णु की आराधना करने से अत्यंत पुण्य की प्राप्ति होती है।
अरुणोदय में एकादशी होने पर द्वादशी को व्रत का विधान
पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा के अनुसार ब्रह्म वैवर्त पुराण में तिथि-विचार के संदर्भ में बताया गया है कि यदि अरुणोदय काल में एकादशी तिथि दिखाई देती है, तो द्वादशी तिथि को ही एकादशी व्रत करने का विधान माना गया है। इसी धार्मिक तिथि-विचार के आधार पर इस बार 24 अगस्त को पुत्रदा एकादशी व्रत रखने की बात कही गई है।
25 अगस्त को होगा व्रत का पारण
पुत्रदा एकादशी व्रत रखने वाले श्रद्धालु अगले दिन 25 अगस्त 2026, मंगलवार को व्रत का पारण कर सकेंगे। दिए गए तिथि-विवरण के अनुसार पारण का समय प्रातः 5 बजकर 59 मिनट से 8 बजकर 49 मिनट तक रहेगा।
संतान सुख की कामना से जुड़ी है पुत्रदा एकादशी
सनातन धर्म में पुत्रदा एकादशी को विशेष महत्व प्राप्त है। मान्यता है कि संतान सुख की कामना रखने वाले दंपती श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया गया है।
राजा महीजित और पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा
पुत्रदा एकादशी की कथा द्वापर युग के प्रारंभ से जुड़ी मानी जाती है। कथा के अनुसार महिष्मति नगरी में राजा महीजित राज्य करते थे। राजा धर्मात्मा थे और अपनी प्रजा का पालन पुत्र के समान करते थे, लेकिन संतान न होने के कारण वे अत्यंत दुखी रहते थे।
राजा की परेशानी देखकर उनके मंत्री और प्रजा के प्रतिनिधि वन में ऋषि-मुनियों के पास पहुंचे। वहां उन्हें महात्मा लोमश ऋषि के दर्शन हुए। उन्होंने राजा की समस्या का कारण जानने के लिए ध्यान किया और बताया कि राजा के पूर्व जन्म के कर्मों के कारण उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा है।
ऋषि ने उपाय बताते हुए कहा कि श्रावण शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत किया जाए और रात्रि में जागरण किया जाए। मंत्रियों तथा प्रजा ने ऋषि के निर्देशानुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य राजा को समर्पित किया। कथा के अनुसार इसके प्रभाव से राजा की रानी ने गर्भ धारण किया और कालांतर में एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ।
इसी कारण श्रावण शुक्ल एकादशी को “पुत्रदा एकादशी” कहा गया। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करने से संतान सुख की कामना पूरी होती है तथा भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
भगवान विष्णु की आराधना का विशेष दिन
पुत्रदा एकादशी के अवसर पर श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, भजन-कीर्तन तथा धार्मिक कथा श्रवण को पुण्यकारी माना जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपनी परंपरा, स्वास्थ्य और स्थानीय पंचांग के अनुसार व्रत-विधि का पालन करना चाहिए।
श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी के इस विशेष संयोग ने धार्मिक दृष्टि से इस पर्व का महत्व और बढ़ा दिया है। 24 अगस्त को श्रद्धालु भगवान विष्णु की आराधना कर व्रत रखेंगे और 25 अगस्त को निर्धारित पारण काल में व्रत पूर्ण करेंगे।







