पापांकुशा एकादशी आज: भगवान विष्णु की आराधना से मिलेगा पुण्य का फल, जानिए व्रत की महिमा, पौराणिक कथा और पारण का शुभ समय
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22 अक्टूबर को रखा जाएगा पापांकुशा एकादशी का व्रत, 23 अक्टूबर की सुबह होगा पारण; श्रीहरि की भक्ति, दान-पुण्य और संयम से जुड़ा है इस पावन तिथि का विशेष महत्व
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// धार्मिक विशेष। सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखकर भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है। यह एकादशी आत्मचिंतन, संयम, भक्ति और दान-पुण्य के माध्यम से जीवन को सद्कर्मों की ओर प्रेरित करने का संदेश देती है। इस वर्ष पापांकुशा एकादशी का व्रत गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा।
पौराणिक मान्यताओं में पापांकुशा एकादशी को मनुष्य को पाप कर्मों से दूर रहने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली तिथि बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, जप, ध्यान और जरूरतमंदों को दान देने से साधक को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करते हैं, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं तथा अपने परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं।
पापांकुशा एकादशी की तिथि और पारण का शुभ समय
पंचांग में दिए गए विवरण के अनुसार, एकादशी तिथि का आरंभ 21 अक्टूबर 2026, बुधवार को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट से हो चुका है। इसका समापन 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार को दोपहर 2 बजकर 47 मिनट पर होगा। उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का व्रत 22 अक्टूबर को रखा जाएगा।
व्रत का पारण शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को सुबह 6 बजकर 27 मिनट से 8 बजकर 42 मिनट के बीच बताया गया है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार पारण का समय सुनिश्चित कर लेना चाहिए।
क्या है पापांकुशा एकादशी का धार्मिक महत्व?
पापांकुशा एकादशी का नाम ही इसके आध्यात्मिक संदेश को प्रकट करता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे पाप रूपी बंधनों से मुक्ति और पुण्य अर्जित करने की प्रेरणा देने वाला व्रत माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ मन, वचन और कर्म की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत करने, भगवान का स्मरण करने और जरूरतमंदों की सहायता करने से जीवन में सकारात्मकता आती है। इस दिन अन्न, जल, तिल, वस्त्र तथा सामर्थ्य के अनुसार अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है। पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनके कल्याण की कामना करने की परंपरा भी इस तिथि से जुड़ी हुई है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा: क्रूर शिकारी को कैसे मिला मुक्ति का मार्ग?
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में विंध्याचल पर्वत पर क्रोधना नाम का एक क्रूर शिकारी रहता था। उसने अपने जीवन में अनेक पशु-पक्षियों का शिकार किया और कई अनुचित कर्म किए। अपने कर्मों के कारण उसका जीवन पाप से जुड़ गया था। जब उसे अपने जीवन के अंतिम समय का भय सताने लगा, तब वह महर्षि अंगिरा के पास पहुंचा।
शिकारी ने ऋषि से अपने कर्मों के लिए पश्चाताप व्यक्त करते हुए मुक्ति का मार्ग पूछा। उसकी व्याकुलता देखकर महर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी के व्रत का महत्व समझाया और भगवान विष्णु की आराधना करने की सलाह दी।
कथा के अनुसार, ऋषि के बताए मार्ग पर चलते हुए शिकारी ने एकादशी का व्रत रखा और श्रद्धापूर्वक भगवान श्रीहरि की पूजा की। व्रत और भक्ति के प्रभाव से उसे अपने पाप कर्मों से मुक्ति का मार्ग प्राप्त हुआ तथा अंततः भगवान के धाम की प्राप्ति हुई।
यह कथा मनुष्य को संदेश देती है कि अपनी गलतियों का बोध होने पर पश्चाताप, सद्कर्म और ईश्वर की भक्ति के मार्ग को अपनाना चाहिए। जीवन में किए गए अनुचित कार्यों से सीख लेकर सही रास्ते पर आगे बढ़ना ही इस कथा की प्रमुख प्रेरणा है।
एकादशी पर किन बातों का रखें विशेष ध्यान?
पापांकुशा एकादशी के अवसर पर श्रद्धालुओं को सात्विक जीवनशैली अपनाने, मन को शांत रखने और भगवान विष्णु के स्मरण में समय बिताने की सलाह दी जाती है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, दशमी तिथि से ही व्रत की तैयारी शुरू कर दी जाती है। इस दौरान चावल तथा तामसिक भोजन से परहेज करने की मान्यता है।
व्रत करने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार भोजन संबंधी नियमों का पालन करते हैं। कई धार्मिक मान्यताओं में दशमी के दिन गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर सहित सात प्रकार के अनाज के सेवन से बचने की बात कही गई है।
एकादशी के दिन क्रोध, अहंकार, छल-कपट और झूठ से दूर रहकर सत्य, संयम तथा सदाचार का पालन करने पर विशेष जोर दिया जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन केवल भोजन संबंधी नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने व्यवहार को बेहतर बनाने और दूसरों के प्रति करुणा रखने का अवसर भी है।
दान-पुण्य और भक्ति से जुड़ा है यह पावन पर्व
पापांकुशा एकादशी पर जरूरतमंदों को अन्न, जल, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करना पुण्यकारी माना जाता है। श्रद्धालु भगवान विष्णु के मंदिरों में दर्शन-पूजन करते हैं तथा घरों में दीप प्रज्वलित कर भजन-कीर्तन और मंत्र जाप करते हैं।
व्रत के दौरान अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है। बुजुर्गों, बच्चों तथा स्वास्थ्य संबंधी परेशानी वाले लोगों को कठोर उपवास रखने के बजाय अपनी स्थिति के अनुरूप धार्मिक परंपराओं का पालन करना चाहिए।
पापांकुशा एकादशी का मूल संदेश यही है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होती, बल्कि अच्छे विचारों, सदाचार, दया, सेवा और जरूरतमंदों की सहायता में भी प्रकट होती है। भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और अपने कर्मों के प्रति सजगता के साथ मनाई जाने वाली यह एकादशी भक्तों को धर्म, संयम और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।
