करोड़ों की सड़कें बनीं तो गुणवत्ता की अग्निपरीक्षा भी हो! निर्माण के पहले दिन से तय हो जवाबदेही, पांच साल में सड़क उखड़ी तो ठेकेदार पर हो कड़ी कार्रवाई
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कोरबा में सड़क निर्माण के नाम पर सरकारी धन खर्च करने से आगे बढ़कर अब टिकाऊ निर्माण, तकनीकी जांच और ठेकेदारों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// कोरबा। शहर में करोड़ों रुपये की लागत से होने वाले सड़क निर्माण और डामरीकरण कार्यों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सड़कें वास्तव में लंबे समय तक टिकने के लिए बनाई जा रही हैं या कुछ ही महीनों में गड्ढों और उखड़ते डामर की समस्या फिर सामने आएगी? सड़क विकास का अर्थ केवल नई परत बिछाना नहीं, बल्कि ऐसी मजबूत सड़क बनाना है, जो यातायात का दबाव सह सके, बारिश में सुरक्षित रहे और जनता के पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करे। निर्माण की गुणवत्ता पर सख्त निगरानी और ठेकेदार की जवाबदेही तय करना समय की मांग है।
सड़क निर्माण में इन 8 मानकों पर हो सख्ती
1. सड़क की उम्र हो तय: सड़क की निर्धारित उपयोग अवधि उसके डिजाइन, यातायात और निर्माण श्रेणी के अनुसार तय हो। सामान्य बिटुमिनस सड़कों में लगभग 5 से 10 वर्ष या उससे अधिक का डिजाइन जीवन संभव है, लेकिन यह हर सड़क के लिए एक जैसा नहीं होता। अनुबंध में स्पष्ट गुणवत्ता मानक और दोष-दायित्व अवधि अनिवार्य होनी चाहिए।
2. नीचे की नींव मजबूत हो: सड़क की मजबूती केवल ऊपर बिछाए गए डामर से नहीं आती। जमीन की जांच, सबग्रेड की उचित तैयारी, मिट्टी का सही कम्पैक्शन और डिजाइन के अनुसार सब-बेस व बेस कोर्स तैयार करना जरूरी है। नींव कमजोर हुई तो महंगा डामर भी ज्यादा समय तक नहीं टिकेगा।
3. डामर की मोटाई में न हो खेल: सड़क की मोटाई मनमाने तरीके से तय नहीं होनी चाहिए। भारी और हल्के यातायात, मिट्टी की क्षमता तथा तकनीकी डिजाइन के अनुसार प्रत्येक परत की मोटाई निर्धारित हो। निर्माण के बाद वास्तविक मोटाई की जांच कराई जाए और निर्धारित मानक से कम पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई हो।
4. सामग्री की हो लैब जांच: डामर, गिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप होनी चाहिए। बिटुमिनस मिश्रण की गुणवत्ता, तापमान, परतों की मोटाई और कम्पैक्शन की जांच निर्माण के दौरान ही हो। केवल कागजों पर गुणवत्ता प्रमाणित करने के बजाय वास्तविक परीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
5. बारिश के पानी की निकासी जरूरी: सड़क पर पानी जमा होना, किनारों का टूटना और नालियों का जाम होना सड़क की उम्र घटा सकता है। सड़क की ढाल, जल निकासी, किनारों की मजबूती और नालियों की व्यवस्था का ध्यान रखा जाए। जहां जरूरी हो, वहां जलभराव की समस्या दूर किए बिना डामरीकरण न कराया जाए।
6. पांच साल की गारंटी और मरम्मत की जिम्मेदारी: संबंधित अनुबंध में पांच साल की दोष-दायित्व अवधि निर्धारित करने का प्रयास हो। यदि इस अवधि में निर्माण संबंधी खामी से सड़क खराब होती है, तो ठेकेदार से अपने खर्च पर मरम्मत कराई जाए। यह अवधि अनुबंध और लागू तकनीकी नियमों के अनुरूप स्पष्ट होनी चाहिए।
7. सड़क जल्दी टूटी तो कार्रवाई भी हो: यदि सड़क कुछ महीनों में उखड़ने लगे, गड्ढे पड़ जाएं या परतें अलग होने लगें, तो केवल पैबंद लगाकर मामला खत्म न किया जाए। पहले तकनीकी जांच हो, खराबी का कारण दर्ज किया जाए और जिम्मेदारी तय की जाए। दोष साबित होने पर अनुबंध के अनुसार भुगतान रोकने, क्षतिपूर्ति वसूलने, जुर्माना लगाने और गंभीर या बार-बार की लापरवाही पर नियमानुसार ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई हो।
8. निर्माण से लेकर रखरखाव तक पारदर्शिता: प्रत्येक सड़क की स्वीकृत लागत, ठेकेदार का नाम, निर्माण की समयसीमा, निर्धारित मोटाई, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट और गारंटी अवधि सार्वजनिक की जाए। सड़क बनने के बाद भी नियमित निरीक्षण हो तथा शिकायतों के निपटारे की समयसीमा तय की जाए।
जनता के पैसे का हिसाब भी जनता को मिले
सड़क निर्माण में खर्च होने वाला धन जनता के करों से आता है। इसलिए हर परियोजना में गुणवत्ता से समझौता रोकना संबंधित विभाग और निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी है। सड़क खराब होने पर यह स्पष्ट होना चाहिए कि कारण घटिया सामग्री है, कमजोर नींव, पानी की निकासी में कमी, अत्यधिक यातायात या कोई अन्य तकनीकी समस्या। जांच के बिना किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन जांच में लापरवाही साबित होने पर कार्रवाई भी टलनी नहीं चाहिए।
सवाल सीधा है—सड़क बनाने का बजट तय है, तो उसकी गुणवत्ता और जवाबदेही भी उतनी ही स्पष्ट क्यों नहीं? कोरबा में बनने वाली प्रत्येक सड़क के लिए मजबूत निर्माण, स्वतंत्र गुणवत्ता जांच, पारदर्शी रिपोर्ट और प्रभावी रखरखाव व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए। विकास का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितनी सड़कें बनीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि वे कितने समय तक सुरक्षित, मजबूत और उपयोगी बनी रहीं।
