पांच दशक सत्ता में रही कांग्रेस, फिर भी बस्तर बुनियादी सुविधाओं से वंचित क्यों रहा? अमित शाह के बयान से गरमाई सियासत
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गृहमंत्री का सवाल—नक्सलवाद खत्म करना ही नहीं, दशकों की पीड़ा मिटाना भी जरूरी; अब बस्तर के हर पीड़ित को सम्मानजनक जीवन देने पर जोर
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//**// रायपुर/बस्तर। बस्तर में दशकों तक बुनियादी सुविधाओं की कमी और नक्सलवाद से प्रभावित परिवारों की पीड़ा को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है। शाह ने कहा कि कांग्रेस के शासन में पांच दशकों तक जिस बस्तर में बुनियादी सुविधाएं तक नहीं पहुंच सकीं, वहां अब सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नक्सलवाद का अंत केवल सुरक्षा की लड़ाई का समापन नहीं है, बल्कि इससे प्रभावित लोगों को सम्मान, सहायता और बेहतर जीवन उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।
अमित शाह के इस बयान का राजनीतिक संदेश साफ है—बस्तर के विकास और वहां के लोगों को मिलने वाली सुविधाओं के सवाल पर अब पुराने शासन के रिकॉर्ड और मौजूदा प्रयासों की चर्चा होगी। सवाल यह है कि यदि दशकों तक आदिवासी अंचल के अनेक इलाकों में बुनियादी सेवाओं की पहुंच सीमित रही, तो इसके कारणों और जिम्मेदारियों पर गंभीर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? जिन परिवारों ने लंबे समय तक असुरक्षा, विस्थापन और सुविधाओं की कमी का सामना किया, उनकी समस्याओं का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जमीन पर दिखना चाहिए।
कांग्रेस के लंबे शासन पर सवाल, बस्तर के विकास का हिसाब कौन देगा?
अमित शाह के बयान के बाद कांग्रेस के लंबे शासनकाल को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की गुंजाइश है। बस्तर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और रोजगार जैसी सुविधाएं किसी सरकार की अतिरिक्त उपलब्धि नहीं, बल्कि नागरिकों की बुनियादी जरूरतें हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जिन क्षेत्रों में लोगों को इन सुविधाओं के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा, वहां विकास की रफ्तार अपेक्षित स्तर तक क्यों नहीं पहुंच सकी? क्या योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा? क्या दूरस्थ गांवों के लोगों को समय पर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकीं? इन सवालों का जवाब राजनीतिक दावों के साथ-साथ वास्तविक आंकड़ों और जमीनी स्थिति के आधार पर भी सामने आना चाहिए।
शाह की टिप्पणी ने कांग्रेस के पूर्व शासनकाल की नीतियों और बस्तर में विकास की स्थिति पर बहस को फिर केंद्र में ला दिया है। हालांकि, पूरे क्षेत्र की परिस्थितियों को समझने के लिए अलग-अलग इलाकों में सुविधाओं की वास्तविक स्थिति और समय के साथ हुए बदलावों का आकलन भी जरूरी है।

नक्सलवाद का अंत, अब पीड़ितों के जीवन में बदलाव की चुनौती
केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि मोदी सरकार का नक्सलमुक्त भारत बनाने का संकल्प पूरा हुआ है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नक्सलवाद के कारण देश और समाज को जो घाव मिले हैं, उन पर मरहम लगाना तथा प्रत्येक पीड़ित को सम्मानपूर्वक जीवनयापन का अवसर देना अब महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
यह मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता, शिक्षा, आजीविका, पुनर्वास और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना भी उतना ही अहम है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया या हिंसा के कारण सामान्य जीवन से दूरी झेली, उनके लिए सुरक्षित वातावरण के साथ स्थायी सहारा सुनिश्चित करना जरूरी है।
सुरक्षा के बाद विकास, बस्तर के सामने नई उम्मीदें
बस्तर में शांति और विकास को लेकर केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं पर पहले भी जोर दिया गया है। गृह मंत्रालय ने मई 2026 में बस्तर के विकास, नक्सलवाद से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को आगे बढ़ाने की बात कही थी। सरकार की घोषित दिशा में सुरक्षा से विश्वास, विश्वास से विकास और विकास से समृद्धि की ओर बढ़ने का लक्ष्य शामिल है। <Cite refs={[“turn197099search1″,”turn197099search3”]}/>
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन संकल्पों का लाभ कितनी तेजी से दूरस्थ गांवों तक पहुंचता है। क्या प्रत्येक पात्र परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा? क्या युवाओं को रोजगार और कौशल प्रशिक्षण के अवसर मिलेंगे? क्या बच्चों को बेहतर शिक्षा और मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध होगा? इन सवालों पर होने वाली प्रगति ही बस्तर के भविष्य की वास्तविक तस्वीर तय करेगी।
राजनीतिक आरोपों से आगे, जनता को चाहिए परिणाम
अमित शाह के बयान ने कांग्रेस के लंबे शासनकाल और वर्तमान सरकार की विकास संबंधी प्राथमिकताओं के बीच तुलना की बहस को हवा दी है। लेकिन बस्तर के लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि उनके जीवन में आने वाला वास्तविक बदलाव है।
दशकों की चुनौतियों से जूझे इस क्षेत्र को अब ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां विकास का लाभ अंतिम गांव और अंतिम परिवार तक पहुंचे। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पुनर्वास जैसी सुविधाएं कागजों से निकलकर लोगों के जीवन का हिस्सा बनें।
बस्तर की जनता को यह जानने का अधिकार है कि अतीत में विकास की बाधाएं क्या थीं, वर्तमान में कौन-से कार्य किए जा रहे हैं और भविष्य में प्रत्येक परिवार तक सुविधाएं पहुंचाने की क्या समयबद्ध योजना है। अमित शाह के बयान से उठा जवाबदेही का सवाल तभी सार्थक होगा, जब राजनीतिक बहस के साथ बस्तर के लोगों को सुरक्षा, सम्मान और बेहतर जीवन के ठोस परिणाम भी मिलें।
