मां चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप: दस भुजाओं में शक्ति, मस्तक पर अर्धचंद्र, भक्तों को मिलता है निर्भयता और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश
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कल 13 अक्टूबर, मंगलवार को होगी मां चंद्रघंटा की पूजा
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//**// शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। माता के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनका वाहन सिंह है और उनका स्वरूप अधर्म के विरुद्ध शक्ति, अन्याय के विरुद्ध साहस तथा जीवन में शांति और संतुलन का प्रतीक माना जाता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप भक्तों को यह प्रेरणा देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, धर्म, सत्य और सदाचार का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की आराधना से मन में साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मक विचारों का संचार होता है। नवरात्रि का यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रेरणादायक है, जो अपने जीवन में संयम, अनुशासन और आध्यात्मिक शांति चाहते हैं।
कैसे करें मां चंद्रघंटा की पूजा? जानिए सरल विधि-विधान
नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करके मां दुर्गा तथा मां चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद दीपक जलाएं और श्रद्धापूर्वक माता का ध्यान करें। पूजा में रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जा सकते हैं। लाल रंग के पुष्प अर्पित करना भी प्रचलित परंपरा है।
माता की पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप किया जा सकता है—
“ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः।”
इसके बाद मां चंद्रघंटा की आरती करें, दुर्गा चालीसा या देवी स्तुति का पाठ करें और परिवार की सुख-शांति, उत्तम स्वास्थ्य, सद्बुद्धि तथा सुखमय जीवन की प्रार्थना करें। पूजा के अंत में माता से जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें और सभी के कल्याण की कामना करें।
पूजा की विधि परिवार की परंपरा और स्थानीय रीति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। श्रद्धा और स्वच्छ मन से की गई साधारण पूजा भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मां चंद्रघंटा को क्या लगाएं भोग?
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध से बनी मिठाई, खीर या अन्य सात्त्विक मिष्ठान अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है। अपनी सुविधा के अनुसार फल, मिश्री या घर में तैयार शुद्ध सात्त्विक प्रसाद भी चढ़ाया जा सकता है। भोग अर्पित करते समय मन में कृतज्ञता और भक्ति का भाव रखें। इसके बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों में बांटें।
नवरात्रि का वास्तविक भाव केवल विशेष भोग या पूजा सामग्री में नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, संयम और अच्छे आचरण में निहित है। माता के सामने परिवार के लिए मंगलकामना करने के साथ जरूरतमंदों की सहायता और दूसरों के प्रति सम्मान का संकल्प भी लेना चाहिए।
युवा पीढ़ी के लिए नवरात्रि क्यों है खास? घर से ही शुरू होते हैं सनातन संस्कार
आज के समय में नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ना महत्वपूर्ण है। इसके लिए केवल उपदेश देना पर्याप्त नहीं, बल्कि घर में संस्कारों को व्यवहार में उतारना भी जरूरी है। नवरात्रि ऐसा अवसर है, जब माता-पिता अपने बच्चों को मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की कथा, उनके प्रतीकात्मक महत्व और धर्म में निहित सदाचार की शिक्षा दे सकते हैं।
जब युवा अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ पूजा में शामिल होते हैं, आरती करते हैं, मंत्रों का अर्थ समझते हैं और परिवार की धार्मिक परंपराओं को जानते हैं, तो उनके मन में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान विकसित हो सकता है। इससे पीढ़ियों के बीच संवाद बढ़ता है और परिवार के सदस्यों को एक साथ समय बिताने का अवसर मिलता है।
सनातन परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि सत्य बोलना, बड़ों का सम्मान करना, महिलाओं का आदर करना, जरूरतमंदों की सहायता करना, प्रकृति की रक्षा करना और सभी के प्रति करुणा रखना भी है। युवा इन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाकर संस्कृति को जीवंत बनाए रख सकते हैं।
परिवार के साथ पूजा: एक दीपक आस्था का, एक संकल्प संस्कारों का
नवरात्रि के तीसरे दिन परिवार के सभी सदस्य कुछ समय एक साथ पूजा के लिए निकालें। बच्चे और युवा माता-पिता के साथ आरती करें, माता के स्वरूप के बारे में जानें और अपनी परंपराओं से जुड़े प्रश्न पूछें। घर में धार्मिक वातावरण के साथ प्रेम, सहयोग और सम्मान का माहौल बनाएं।
परिवार चाहे बड़ा हो या छोटा, पूजा की भव्यता से अधिक महत्वपूर्ण है सभी सदस्यों की सहभागिता। यदि कोई सदस्य पूजा में शामिल नहीं हो पाता, तो उसे सम्मानपूर्वक अवसर दें; आस्था का उद्देश्य जोड़ना है, दबाव बनाना नहीं। यही भाव परिवार को मजबूत करता है और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है।
मां चंद्रघंटा की आराधना का संदेश: शक्ति के साथ शांति, आस्था के साथ सदाचार
मां चंद्रघंटा का तीसरा नवरात्रि दिवस हमें याद दिलाता है कि वास्तविक शक्ति केवल साहस में नहीं, बल्कि अपने क्रोध पर नियंत्रण रखने, अन्याय के विरुद्ध सही तरीके से खड़े होने और कठिन परिस्थितियों में विवेक बनाए रखने में भी है। परिवार के साथ पूजा करना, बच्चों को धार्मिक परंपराओं का महत्व समझाना और समाज के प्रति अपने दायित्व निभाना इसी भावना को जीवन में उतारने के मार्ग हैं।
आइए, नवरात्रि के तीसरे दिन संकल्प लें कि मां चंद्रघंटा की आराधना के साथ अपने घरों में प्रेम, सद्भाव, सेवा और संस्कारों का दीप जलाएंगे। युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ेंगे और सनातन परंपरा के उन मूल्यों को आगे बढ़ाएंगे, जो परिवार, समाज और मानवता को एक सूत्र में बांधते हैं।
जय माता दी! जय मां चंद्रघंटा!
