वरुथिनी एकादशी 2026: दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाला दिव्य व्रत, इस दिन करें उपवास तो मिलेगा अक्षय पुण्य का वरदान



द्वादशी युक्त एकादशी का विशेष संयोग, 14 अप्रैल को रखा जाएगा व्रत — 15 अप्रैल को शुभ पारण, जानिए महिमा और अद्भुत कथा
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ***//** कोरबा, 12अप्रैल 2026
वैशाख माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली पवित्र वरुथिनी एकादशी इस वर्ष अत्यंत विशेष संयोग लेकर आई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह एकादशी न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने वाली मानी जाती है। इस बार तिथि और व्रत के नियमों को लेकर विशेष सावधानी रखने की आवश्यकता है, क्योंकि द्वादशी युक्त एकादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वरुथिनी एकादशी तिथि का प्रारंभ 13 अप्रैल 2026 को रात्रि 01:17 बजे (AM) से होगा और इसका समापन 14 अप्रैल 2026 को रात्रि 01:09 बजे (AM) पर होगा। शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार, द्वादशी युक्त एकादशी का व्रत करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसी कारण 14 अप्रैल 2026, मंगलवार को व्रत रखा जाना अधिक फलदायी और शास्त्रसम्मत बताया गया है।
🔶 पारण का शुभ मुहूर्त:
व्रत का पारण 15 अप्रैल 2026, बुधवार को प्रातः 06:00 बजे से 09:15 बजे के मध्य करना शुभ रहेगा।
🟩 वरुथिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यह एकादशी व्रत करने से मनुष्य को हजारों वर्षों तक किए गए तप के समान फल प्राप्त होता है। यह व्रत व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिलाकर जीवन में सुख, समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करता है। इसे रक्षा प्रदान करने वाली एकादशी भी कहा जाता है।
🟦 अद्भुत व प्रेरणादायक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से इस एकादशी के महत्व के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान श्रीकृष्ण ने एक प्राचीन कथा सुनाई—
प्राचीन काल में मान्धाता नाम के एक धर्मपरायण राजा थे, जो सदैव भगवान की भक्ति में लीन रहते थे। एक दिन जब वे जंगल में तपस्या कर रहे थे, तभी एक भालू ने उन पर हमला कर दिया और उनका पैर खा गया। अत्यंत पीड़ा में राजा ने भगवान विष्णु का स्मरण किया।
भगवान विष्णु प्रकट हुए और अपने सुदर्शन चक्र से भालू का वध कर दिया, लेकिन तब तक राजा अपना एक पैर खो चुके थे। दुखी राजा को भगवान ने मथुरा जाकर वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने और उनके वराह अवतार की पूजा करने का निर्देश दिया।
राजा ने पूर्ण श्रद्धा के साथ व्रत किया और उसके प्रभाव से उन्हें अपना खोया हुआ पैर पुनः प्राप्त हो गया। भगवान ने बताया कि यह कष्ट उनके पूर्व जन्म के कर्मों का फल था, जो इस व्रत से समाप्त हो गया।
🟪 संदेश
यह पावन एकादशी हमें यह सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति से असंभव भी संभव हो जाता है। जीवन में चाहे कितनी भी विपत्ति क्यों न आए, भगवान का स्मरण और धर्म का मार्ग अपनाने से हर कष्ट दूर किया जा सकता है।
✍️ नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा द्वारा प्रदत्त जानकारी पर आधारित


