April 7, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

खबरें जरा हट के

धान से बदलाव की राह: बालको की पहल से मूंगफली बनी ग्रामीण किसानों की नई ‘कैश क्रॉप’

 

‘मोर जल मोर माटी’ योजना ने बदली 40 गांवों की खेती की तस्वीर, हजारों किसानों को मिल रही अतिरिक्त आय और आत्मनिर्भरता की नई दिशा
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा****//**  बालकोनगर/कोरबा।
कोरबा अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में खेती की पारंपरिक तस्वीर अब तेजी से बदल रही है। जहां कभी किसान केवल अधिक पानी वाली धान की खेती पर निर्भर थे, वहीं अब वे कम लागत, कम पानी और अधिक लाभ देने वाली मूंगफली की खेती को अपनाकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
इस सकारात्मक बदलाव के केंद्र में है भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की महत्वाकांक्षी और प्रभावी योजना ‘मोर जल मोर माटी’, जिसने गांवों की खेती, किसानों की सोच और आय के स्वरूप—तीनों को बदलने का काम किया है।
बालको की यह पहल अब केवल एक कृषि परियोजना नहीं, बल्कि ग्रामीण आर्थिक बदलाव, जल संरक्षण और टिकाऊ खेती की मिसाल बनती जा रही है।
कंपनी इस योजना के माध्यम से कोरबा के आसपास के 40 गांवों के 9,000 से अधिक किसानों को जल प्रबंधन, आधुनिक कृषि तकनीक, पशुपालन, गैर-लकड़ी वन उत्पादों और किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) से जोड़ते हुए समग्र ग्रामीण विकास की दिशा में कार्य कर रही है।
मूंगफली बनी किसानों की नई उम्मीद
एक समय था जब इस क्षेत्र में मूंगफली की खेती बेहद सीमित थी। कुछ किसान इसे केवल घरेलू उपयोग के लिए उगाते थे।
पारंपरिक खेती पद्धति, बेहतर बीजों की कमी, तकनीकी जानकारी का अभाव और बाजार तक पहुंच न होने के कारण किसानों को न तो अच्छी पैदावार मिलती थी और न ही उचित लाभ।
लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है।
बालको ने किसानों को उन्नत बीज, संतुलित खाद, तकनीकी मार्गदर्शन और आधुनिक खेती के प्रशिक्षण उपलब्ध कराकर खेती को नई दिशा दी है।
किसानों को लाइन से बुवाई, बीज उपचार, वैज्ञानिक खाद प्रबंधन और फसल देखभाल जैसी उन्नत तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया, जिसका सीधा असर उत्पादन और आय पर देखने को मिला।
50 से 1000 किसान तक… खेती में आया ऐतिहासिक विस्तार
बालको की इस पहल का प्रभाव अब जमीनी स्तर पर साफ दिखाई दे रहा है।
जहां पहले 50 से भी कम किसान मूंगफली की खेती करते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर करीब 1,000 किसानों तक पहुंच गई है।
यह बदलाव केवल संख्या का नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण और खेती के आधुनिक रूपांतरण का प्रतीक है।
आज किसान प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल तक मूंगफली उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं, जिससे उन्हें 45 हजार से 55 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय मिल रही है।
वर्ष 2026 में 470 से अधिक परिवारों को इस पहल से प्रत्यक्ष लाभ मिला, जबकि करीब 200 नए परिवारों ने भी इस खेती को अपनाना शुरू कर दिया है।
यह साबित करता है कि यदि किसानों को सही समय पर तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाए, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सम्मानजनक आय का मजबूत साधन बन सकती है।
महिलाएं भी बन रहीं बदलाव की धुरी
इस पहल का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि इसमें महिला किसान भी आगे आ रही हैं और खेती को नए आत्मविश्वास के साथ अपना रही हैं।
भटगांव की किसान सुनीता राठिया इस बदलाव की सशक्त मिसाल बनकर उभरी हैं।
उन्होंने बताया कि पहले वे केवल धान की खेती करती थीं, जिसमें अधिक पानी, अधिक लागत और सीमित लाभ होता था।
लेकिन ‘मोर जल मोर माटी’ परियोजना से जुड़ने के बाद उन्हें मूंगफली की उन्नत खेती की जानकारी, बेहतर बीज और उर्वरक उपलब्ध कराए गए।
सुनीता राठिया के अनुसार,
“मैंने पहली बार मूंगफली की खेती की और मुझे बहुत अच्छा उत्पादन मिला। इस फसल में पानी कम लगता है और बाजार में भी अच्छा दाम मिलता है। अब मेरी आय बढ़ी है और मैं आगे इसे और बढ़ाने की योजना बना रही हूं।”
उनकी यह सफलता न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही है, बल्कि क्षेत्र की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
किसानों की मेहनत को मिला तकनीक का साथ
बुंदेली गांव के किसान कन्हैया लाल की कहानी भी इस बदलाव की एक मजबूत मिसाल है।
वे पहले पारंपरिक तरीकों से खेती करते थे, जिससे अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पाता था।
परियोजना से जुड़ने के बाद उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण मिला, जिसका सकारात्मक असर उनकी खेती पर साफ दिखाई दिया।
अब उनकी मूंगफली की पैदावार बढ़कर 8 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गई है।
इससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।
कन्हैया लाल अब माइक्रो-इरिगेशन, उन्नत बीज और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
वे आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बनते जा रहे हैं।
सिर्फ कमाई नहीं, मिट्टी और पानी भी बचा रही यह खेती
मूंगफली की खेती का लाभ केवल अतिरिक्त आय तक सीमित नहीं है।
इस फसल को अपनाने से जमीन की उर्वरता में सुधार हो रहा है, जिससे अगली फसलों का उत्पादन भी बेहतर होने लगा है।
साथ ही, धान की तुलना में इसमें पानी की खपत कम होती है, जिससे जल संरक्षण को भी बल मिल रहा है।
आज जब खेती में जल संकट, बढ़ती लागत और घटती लाभप्रदता जैसी चुनौतियां सामने हैं, ऐसे समय में बालको की यह पहल कृषि परिवर्तन और सतत विकास का सफल मॉडल बनकर उभर रही है।
ग्रामीण विकास की नई दिशा बन रही बालको की पहल
‘मोर जल मोर माटी’ योजना यह साबित कर रही है कि यदि उद्योग और समाज साथ मिलकर काम करें, तो गांवों में स्थायी, सम्मानजनक और आत्मनिर्भर विकास संभव है।
बालको ने केवल किसानों को खेती सिखाने का काम नहीं किया, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, तकनीकी समझ, बाजार की पहचान और नई सोच भी दी है।
आज मूंगफली की खेती कोरबा अंचल के किसानों के लिए सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि उम्मीद, उन्नति और आत्मनिर्भरता का नया रास्ता बन चुकी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.