August 14, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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तीन महीने बाद भी जांच शुरू नहीं: नगर सेना विभाग में महिला सैनिकों का फूटा गुस्सा, विशाखा कमेटी को शिकायत के बाद भी कार्रवाई शून्य

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अभद्रता, मानसिक प्रताड़ना और अशोभनीय व्यवहार के आरोपों पर प्रशासन मौन… महिला सैनिकों में उबाल, कभी भी फूट सकता है आंदोलन

त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//**  कोरबा जिले के नगर सेना विभाग में महिला सैनिकों के साथ कथित अभद्र व्यवहार, मानसिक प्रताड़ना, अपमानजनक टिप्पणियों और अशोभनीय आचरण का मामला अब गंभीर प्रशासनिक सवाल बनता जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विशाखा कमेटी को शिकायत दिए हुए लगभग तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक जांच शुरू नहीं होने से महिला सैनिकों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
विभाग के भीतर हालात इतने तनावपूर्ण बताए जा रहे हैं कि महिला सैनिकों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। लगातार शिकायतों, लिखित आवेदनों और उच्च अधिकारियों तक मामला पहुंचाने के बावजूद यदि अब भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह नाराजगी कभी भी उग्र आंदोलन का रूप ले सकती है।
शिकायत पर चुप्पी क्यों? महिला सैनिकों ने उठाए प्रशासन पर गंभीर सवाल
नगर सेना विभाग में तैनात महिला सैनिकों और अन्य सैनिकों द्वारा दिए गए शिकायत पत्रों में जिला सेनानी श्री ए. के. एक्का के खिलाफ अशोभनीय व्यवहार, मानसिक दबाव, अपमानजनक लहजे और महिला गरिमा के प्रतिकूल आचरण जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने केवल मौखिक विरोध नहीं किया, बल्कि मामले को विधिवत लिखित रूप में कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, महिला आयोग, विभागीय अधिकारियों और विशाखा कमेटी तक पहुंचाया।
इसके बावजूद यदि जांच की प्रक्रिया तक शुरू नहीं हो रही, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि शिकायतकर्ताओं के अनुसार महिला सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मामलों को हल्के में लेने जैसा है।
महिला सैनिकों का कहना है कि जब एक संवेदनशील शिकायत पर भी समयबद्ध कार्रवाई नहीं होती, तो इससे पीड़ित पक्ष का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है।
विशाखा कमेटी को आवेदन, लेकिन जांच का कोई अता-पता नहीं
सूत्रों और शिकायतकर्ताओं के अनुसार, महिला सैनिकों ने कार्यस्थल पर उत्पीड़न और अपमानजनक व्यवहार को लेकर संबंधित मंचों पर आवेदन दिया था। इस मामले को विशाखा कमेटी तक भी पहुंचाया गया, ताकि निष्पक्ष जांच हो और पीड़ित पक्ष को न्याय मिल सके। लेकिन अब आरोप यह है कि तीन महीने गुजर जाने के बाद भी जांच प्रारंभ तक नहीं हुई।

 

 

यही वह बिंदु है, जिसने महिला सैनिकों के भीतर न्याय व्यवस्था को लेकर गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि जब शिकायतें लिखित रूप में मौजूद हैं, तो फिर जांच शुरू करने में आखिर देरी क्यों?
क्या मामला दबाया जा रहा है?
क्या शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया?
या फिर विभागीय दबाव के कारण प्रक्रिया ठंडी पड़ गई?
ये ऐसे सवाल हैं, जो अब विभागीय गलियारों से निकलकर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं।
“हर दिन तनाव, हर दिन अपमान का डर” — महिला सैनिकों में बढ़ती बेचैनी
महिला सैनिकों के बीच इस पूरे मामले को लेकर लगातार भय, तनाव और आक्रोश का माहौल बताया जा रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, कई महिला सैनिक अब यह महसूस कर रही हैं कि यदि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं होती, तो उनकी सुरक्षा, सम्मान और आवाज – तीनों ही खतरे में हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कार्यस्थल का वातावरण सामान्य नहीं रह गया है। रोजमर्रा की ड्यूटी, बातचीत, आदेश और अनुशासन के नाम पर जो माहौल बन रहा है, उसने महिला सैनिकों के मन में असुरक्षा और अपमान की भावना को और गहरा कर दिया है।
यही कारण है कि अब यह मामला केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं, बल्कि महिला सम्मान और कार्यस्थल की गरिमा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।
कार्रवाई नहीं तो आंदोलन तय? अंदर ही अंदर सुलग रहा आक्रोश
विभाग के भीतर चर्चा यह भी है कि यदि प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी अब भी चुप्पी साधे रहे, तो यह मामला कभी भी फूट पड़ सकता है। महिला सैनिकों और अन्य कर्मचारियों के बीच लगातार बढ़ती नाराजगी इस ओर संकेत कर रही है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन, विरोध मार्च या कानूनी मोर्चे तक पहुंच सकता है।
शिकायतकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि उन्होंने व्यवस्था पर भरोसा करते हुए पहले आवेदन, फिर प्रतीक्षा और फिर दोबारा शिकायत का रास्ता अपनाया, लेकिन अब यदि फिर भी न्याय नहीं मिला, तो वे सार्वजनिक और कानूनी लड़ाई के लिए मजबूर होंगे।
यह भी कहा जा रहा है कि यदि स्थिति को समय रहते नहीं संभाला गया, तो विभाग में बढ़ता असंतोष कभी भी बड़े संगठनात्मक विवाद में बदल सकता है।
महिला सुरक्षा के दावों पर उठ रहे सवाल
यह पूरा मामला एक बार फिर सरकारी और अर्द्धसैनिक कार्यालयों में महिला सुरक्षा, सम्मान और शिकायत निवारण तंत्र की वास्तविक स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। जब एक महिला कर्मचारी या महिला सैनिक अपनी शिकायत लेकर आधिकारिक मंच तक जाती है, तो उसकी सबसे पहली उम्मीद होती है — समयबद्ध, निष्पक्ष और संवेदनशील जांच।
लेकिन यदि विशाखा कमेटी को आवेदन देने के बाद भी महीनों तक जांच शुरू नहीं होती, तो यह स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जाएगी। इससे न केवल पीड़ितों का मनोबल टूटता है, बल्कि अन्य महिलाओं में भी यह संदेश जाता है कि शिकायत करने के बाद भी व्यवस्था तुरंत साथ खड़ी नहीं होती।
प्रशासनिक चुप्पी से और भड़क सकता है मामला
कोरबा में यह मामला अब सिर्फ विभागीय सीमाओं में कैद नहीं रहा। धीरे-धीरे यह मुद्दा महिला अधिकार, कार्यस्थल की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है। शिकायतों की गंभीरता, जांच में देरी और बढ़ते असंतोष को देखते हुए अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जिला प्रशासन, विभागीय अधिकारी और संबंधित जांच तंत्र आखिर कब जागेगा।
यदि प्रशासन ने अब भी त्वरित कदम नहीं उठाए, तो महिला सैनिकों का यह गुस्सा सड़क पर उतर सकता है, और तब मामला केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का प्रश्न बन जाएगा।
महिला सैनिकों का साफ संदेश — “सम्मान चाहिए, चुप्पी नहीं”
महिला सैनिकों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वे किसी प्रकार का टकराव नहीं चाहतीं, लेकिन वे अपमान, प्रताड़ना और अनदेखी को अब और सहन करने के मूड में नहीं हैं। उनका कहना है कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से कर रही हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें सम्मान, सुरक्षा और न्याय मिलना चाहिए।
अब यह मामला प्रशासन के सामने एक लिटमस टेस्ट की तरह खड़ा है —
क्या महिला सैनिकों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा?
क्या जांच शुरू होगी?
क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?
या फिर फाइलों में दबा यह मामला आंदोलन की चिंगारी बन जाएगा?

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