August 14, 2026

त्रिनेत्र टाईम्स

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भक्ति, भाव और पुण्य का महासंगम: 108 निर्धन कन्याओं के विवाह के साथ ढपढप में दिव्य श्री हनुमंत कथा का अलौकिक समापन

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बाबा बागेश्वर के दरबार में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, भजन गायक सोनू भाटिया भावविभोर… गुरु कृपा के दिव्य क्षण ने भक्तों को कर दिया भावुक
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा ****//**  कोरबा/बांकीमोंगरा।
कोरबा जिले के वनांचल क्षेत्र स्थित ग्राम ढपढप (बांकीमोंगरा) की पावन धरती पर आयोजित दिव्य श्री हनुमंत कथा का समापन सोमवार को भक्ति, भाव, सेवा और सनातन संस्कारों के अद्भुत संगम के साथ हुआ।
श्री बागेश्वर धाम सरकार पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी महाराज के श्रीमुख से पांच दिनों तक प्रवाहित हुई कथा ने न केवल पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया, बल्कि समापन दिवस पर 108 निर्धन कन्याओं के सामूहिक विवाह ने इस आयोजन को पुण्य, सेवा और लोककल्याण का अनुपम महापर्व बना दिया।

 

 

 

जंगलों और ग्रामीण परिवेश के बीच बसे छोटे से ग्राम ढपढप में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने यह साबित कर दिया कि जहां भक्ति सच्ची हो, वहां सीमित संसाधन भी विराट आस्था का रूप ले लेते हैं।
कथा के अंतिम दिन ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि पूरा परिसर “जय श्रीराम”, “जय बजरंगबली” और “बागेश्वर धाम सरकार की जय” के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
108 निर्धन कन्याओं का सामूहिक विवाह बना आयोजन का सबसे पावन अध्याय
इस पांच दिवसीय दिव्य आयोजन का सबसे मार्मिक और पुण्यदायी दृश्य वह रहा, जब 108 निर्धन कन्याओं का सामूहिक विवाह अत्यंत गरिमामय और धार्मिक वातावरण में संपन्न कराया गया।
यह भव्य आयोजन अपना घर सेवा आश्रम परिवार द्वारा संपन्न कराया गया, जिसमें उपस्थित श्रद्धालुओं ने स्वयं को केवल दर्शक नहीं, बल्कि इस पुण्य यज्ञ का सहभागी माना।
कोई बाराती बना, कोई घराती, तो कोई बेटियों के जीवन की इस नई शुरुआत का साक्षी बनकर भावुक हो उठा।
भारतीय सनातन परंपरा में निर्धन कन्याओं का विवाह अत्यंत पुण्यकारी और श्रेष्ठ सेवा मानी जाती है।
ऐसे आयोजन केवल सामाजिक दायित्व नहीं निभाते, बल्कि यह संदेश भी देते हैं कि धर्म का वास्तविक स्वरूप सेवा, करुणा और किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियां पहुंचाने में है।
ढपढप की पवित्र धरती पर एक साथ 108 बेटियों के हाथ पीले होना अपने आप में महादान, महापुण्य और लोकसेवा का दुर्लभ उदाहरण बन गया।
भजनों से झूम उठा बाबा का दरबार
समापन दिवस पर कथा स्थल का वातावरण केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि भक्तिरस और भावनाओं से ओतप्रोत दिखाई दिया।
भजनों और संकीर्तन की मधुर स्वर लहरियों ने ऐसा माहौल बनाया कि श्रद्धालु अपने आप को रोक नहीं पाए और पूरा पंडाल भक्ति के रंग में झूम उठा।
बाबा के दरबार में गूंजते भजन, जयकारों की अनुगूंज, संतों की उपस्थिति और भक्तों की उमंग ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह केवल कथा का समापन नहीं, बल्कि आस्था के चरम उत्कर्ष का दिव्य क्षण था।
जब गुरु ने पढ़ लिया भक्त का मन… मंच पर भावुक हुए सोनू भाटिया
इस पूरे आयोजन का सबसे भावुक और अविस्मरणीय क्षण वह रहा, जब श्री बागेश्वर धाम सरकार पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने सिख समाज से श्री सोनू भाटिया एवं उनके चाचा श्री परविंदर सिंह भाटिया को मंच पर बुलाया।
सोनू भाटिया, जो कोरबा जिले में एक धार्मिक भजन गायक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं, गुरु जी के समक्ष पहुंचते ही भावनाओं से भर उठे।
बताया जाता है कि वे मन ही मन यही सोच रहे थे कि गुरु जी आज वापस चले जाएंगे और शायद उन्हें उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने का अवसर नहीं मिल पाएगा।
लेकिन जैसे ही मंच से उन्हें बुलावा आया, मानो उनके मन की प्रार्थना सीधे गुरु तक पहुंच गई।
मंच पर पहुंचते ही सोनू भाटिया ने भावविभोर होकर गुरु जी के चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद प्राप्त किया।
उस क्षण उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े और वे भावनाओं में बहते हुए गुरु जी से लिपटकर रोने लगे।
उन्होंने भावुक स्वर में कहा —
“आपने मेरे मन के भाव कैसे जान लिए?”
यह दृश्य देखकर उपस्थित हजारों श्रद्धालु भी भावुक हो उठे।
पूरे पंडाल में कुछ पल के लिए ऐसा मौन और भावलोक छा गया, मानो भक्ति, श्रद्धा और गुरु कृपा एक साथ मूर्त रूप में उतर आई हो।
गुरु कृपा का अलौकिक क्षण, 30 मिनट तक मंच पर दिया स्नेह
श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने भी इस भावनात्मक क्षण को अत्यंत सहजता और स्नेह के साथ स्वीकार किया।
उन्होंने सोनू भाटिया को आशीर्वाद दिया, भभूति लेकर जाने को कहा और उन्हें लगभग 30 मिनट तक मंच पर अपने साथ रुकने का अवसर दिया।

 

 

 

गुरु और भक्त के इस अद्भुत मिलन ने वहां उपस्थित श्रद्धालुओं को भीतर तक स्पर्श किया।
भक्तों ने इसे गुरु कृपा, मनोभावों की अनुभूति और सच्ची श्रद्धा की दिव्य पहचान के रूप में देखा।
यह दृश्य इस बात का जीवंत प्रमाण बन गया कि जब भाव सच्चे हों, तो गुरु तक बिना शब्दों के भी सब पहुंच जाता है।
जंगल की धरती पर उमड़ा आस्था का महासागर
ग्राम ढपढप जैसे वनांचल क्षेत्र में इतने विशाल स्तर पर आयोजित यह कार्यक्रम स्वयं में एक ऐतिहासिक घटना बन गया।
जंगलों और प्राकृतिक शांति के बीच कथा स्थल पर पहुंची भीड़ ने हर किसी को चौंका दिया।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार अपने क्षेत्र में इतनी विशाल, अनुशासित और भक्तिमय भीड़ देखी।
पूरा क्षेत्र पांच दिनों तक आस्था, सनातन ऊर्जा, भक्ति और सेवा के रंग में डूबा रहा।
यह आयोजन केवल कथा नहीं रहा, बल्कि इसने ढपढप की धरती को एक आध्यात्मिक तीर्थ और सामाजिक चेतना के केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया।
भक्ति, सेवा और संस्कार का अविस्मरणीय संदेश
दिव्य श्री हनुमंत कथा के इस भव्य समापन ने यह संदेश दिया कि धर्म केवल सुनने की चीज नहीं, बल्कि जीने की साधना है।
जहां कथा हो, वहां सेवा भी हो; जहां भक्ति हो, वहां संस्कार भी हों; और जहां गुरु कृपा हो, वहां मानवता भी जीवित रहे—
ढपढप की पावन धरती पर यही दिव्य संदेश साकार होता दिखाई दिया।
108 निर्धन कन्याओं का विवाह,
गुरु-भक्त का भावनात्मक मिलन,
भक्ति में झूमता दरबार,
और वनांचल में उमड़ा श्रद्धा का महासागर —
इन सबने मिलकर इस आयोजन को सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक युगांतकारी आध्यात्मिक स्मृति बना दिया।

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