मां दुर्गा को विदाई देने से पहले क्यों खेलती हैं महिलाएं सिंदूर? आस्था, सुहाग और शक्ति का अनूठा संगम है सिंदूर खेला की परंपरा
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पुराने समय से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं में छिपा है नारी सम्मान और मंगलकामना का संदेश, मां के चरणों में श्रद्धा अर्पित कर एक-दूसरे को सिंदूर लगाने की परंपरा आज भी रखती है विशेष महत्व
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**// कोरबा। नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना, पूजा-अर्चना और भक्ति में डूबे भक्तों के लिए विजयादशमी का अवसर भावनाओं से भरा होता है। मां की विदाई से पहले कई स्थानों पर महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला की परंपरा निभाती हैं। लाल सिंदूर से सजे चेहरे, एक-दूसरे के प्रति स्नेह और मां दुर्गा के जयकारों के बीच यह परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, मंगलकामना, पारिवारिक सुख-समृद्धि और नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक बन जाती है।
लेकिन सवाल यह है कि मां दुर्गा की विदाई से पहले सिंदूर क्यों लगाया जाता है? महिलाएं एक-दूसरे के साथ सिंदूर क्यों खेलती हैं? इस परंपरा के पीछे कौन-सी मान्यताएं और इतिहास जुड़े हैं? इन सवालों के जवाब भारतीय धार्मिक परंपराओं और विशेष रूप से बंगाल की दुर्गा पूजा की सांस्कृतिक विरासत में मिलते हैं।
बंगाल से जुड़ी है सिंदूर खेला की ऐतिहासिक परंपरा
सिंदूर खेला का विशेष संबंध पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा से माना जाता है। विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई से पहले विवाहित महिलाएं देवी को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे के माथे तथा गालों पर सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं। कई स्थानों पर इसे सिंदूर खेला कहा जाता है।
इस परंपरा का प्रचलन बंगाल की दुर्गा पूजा संस्कृति में लंबे समय से रहा है। हालांकि इसकी शुरुआत कब और किस स्थान से हुई, इसे लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक विवरण मिलते हैं। इसलिए इसकी किसी एक निश्चित शुरुआत को प्रमाणित तथ्य के रूप में बताना उचित नहीं होगा।
समय के साथ यह परंपरा बंगाल से बाहर भी लोकप्रिय हुई। आज देश के विभिन्न हिस्सों में दुर्गा पूजा के दौरान महिलाएं अपनी स्थानीय परंपराओं के अनुसार सिंदूर अर्पण और आपसी मंगलकामना के कार्यक्रम आयोजित करती हैं।
मां दुर्गा को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है?
हिंदू धार्मिक परंपरा में सिंदूर को सौभाग्य, मंगल और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मां दुर्गा को शक्ति स्वरूपा मानकर उनकी पूजा की जाती है। ऐसे में देवी को सिंदूर अर्पित करना श्रद्धा और समर्पण की अभिव्यक्ति है।
विवाहित महिलाएं इस अवसर पर अपने परिवार के सुख, शांति और समृद्धि की कामना करती हैं। पारंपरिक मान्यताओं में पति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना भी इससे जुड़ी हुई है। हालांकि ये धार्मिक विश्वास हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम नहीं।
सिंदूर खेला का भाव केवल अपने परिवार की खुशहाली तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के बीच अपनत्व, शुभकामना और सामूहिक उत्सव का अवसर भी बनता है।
एक-दूसरे को सिंदूर लगाने का क्या है महत्व?
मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इस रस्म में एक महिला दूसरी महिला के जीवन में सुख, शांति और खुशहाली की कामना करती है। यह आपसी स्नेह, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करने का सांस्कृतिक माध्यम भी है।
लाल रंग को भारतीय परंपरा में ऊर्जा, शक्ति, उत्साह और शुभता से जोड़ा जाता है। इसी कारण सिंदूर खेला के दौरान पूरा वातावरण लाल रंग की आभा और उत्सवी उल्लास से भर उठता है। महिलाएं एक-दूसरे को शुभकामनाएं देती हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेती हैं और मां दुर्गा से परिवार तथा समाज के कल्याण की प्रार्थना करती हैं।
पुराने जमाने में भी क्यों विशेष था सिंदूर का स्थान?
प्राचीन भारतीय समाज में सिंदूर का महत्व मुख्य रूप से धार्मिक, सांस्कृतिक और वैवाहिक परंपराओं से जुड़ा रहा है। विवाहित महिलाओं के मस्तक पर सिंदूर को सुहाग के पारंपरिक चिह्न के रूप में देखा जाता रहा है। पूजा-पाठ और मांगलिक अवसरों पर लाल रंग तथा सिंदूर का प्रयोग शुभता की भावना से किया जाता था।
समय और क्षेत्र के अनुसार इन रीति-रिवाजों में अंतर भी रहा है। बंगाल की दुर्गा पूजा में सिंदूर खेला ने विशेष सामुदायिक स्वरूप ग्रहण किया, जहां महिलाएं देवी को विदाई देने से पहले एक साथ यह रस्म निभाती हैं। इस प्रकार परंपरा ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी प्राप्त की।
पुरानी पीढ़ियों से नई पीढ़ियों तक पहुंचती यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है।
मां दुर्गा की विदाई में खुशी भी, भावुकता भी
विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई को कई भक्त भावुक क्षण के रूप में अनुभव करते हैं। नौ दिनों तक घरों और पूजा पंडालों में आराधना करने के बाद देवी की विदाई का अर्थ होता है अगले वर्ष फिर उनके आगमन की प्रतीक्षा।
बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को बेटी के रूप में भी देखा जाता है, जो अपने मायके आती हैं और फिर विदा होती हैं। इसी भावनात्मक कल्पना के कारण विदाई के समय श्रद्धा के साथ उल्लास भी दिखाई देता है। सिंदूर खेला इस भाव को और गहरा करता है। महिलाएं मां को विदाई देते हुए उनके पुनः आगमन की कामना करती हैं।
आज की पीढ़ी के लिए क्या है इस परंपरा का संदेश?
आज के दौर में सिंदूर खेला केवल एक पारंपरिक रस्म नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को समझने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी है। युवा पीढ़ी जब परिवार की महिलाओं और बुजुर्गों के साथ ऐसे आयोजनों में शामिल होती है, तो उसे धार्मिक मान्यताओं, पारिवारिक परंपराओं और सामूहिक उत्सव की भावना को करीब से जानने का अवसर मिलता है।
इस परंपरा को निभाते समय यह भी जरूरी है कि महिलाओं की गरिमा, व्यक्तिगत पसंद और आपसी सम्मान का ध्यान रखा जाए। सिंदूर खेला में भाग लेना किसी महिला के वैवाहिक जीवन या धार्मिक आस्था की परीक्षा नहीं है। उत्सव का मूल भाव प्रेम, श्रद्धा और मंगलकामना होना चाहिए।
सिंदूर के लाल रंग में झलकती है आस्था और नारी शक्ति
मां दुर्गा शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रतीक हैं। उनकी आराधना के बाद सिंदूर खेला महिलाओं के सामूहिक उत्साह और सांस्कृतिक एकजुटता का सुंदर रूप प्रस्तुत करता है। इसमें धार्मिक विश्वास, पुरानी परंपराएं, परिवार के प्रति मंगलकामना और महिलाओं के बीच स्नेह एक साथ दिखाई देते हैं।
नवरात्रि की विदाई के इस अवसर पर सिंदूर का लाल रंग मानो यही संदेश देता है कि मां दुर्गा की शक्ति और उनके प्रति श्रद्धा केवल पूजा पंडालों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन में साहस, सम्मान, सद्भाव और सकारात्मकता के रूप में भी बनी रहनी चाहिए।
सिंदूर खेला की असली सुंदरता केवल माथे पर लगे लाल रंग में नहीं, बल्कि उस भावना में है जिसके साथ महिलाएं मां दुर्गा को विदाई देती हैं और एक-दूसरे के जीवन में सुख, सम्मान तथा खुशहाली की कामना करती हैं।
