75 दिनों तक माता की अनुमति का इंतजार! बस्तर दशहरा में आखिर क्यों सर्वोपरि है देवी का आदेश? कांटों के झूले से मुरिया दरबार तक, जानिए आस्था, आदिवासी परंपरा और राजधर्म की अद्भुत गाथा
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न रावण दहन, न केवल उत्सव की धूम—यहां माता की स्वीकृति से शुरू होता है विश्वप्रसिद्ध महापर्व! काछनगादी की रहस्यमयी रस्म, विशाल काष्ठ रथ, आदिवासी एकता और सदियों पुरानी परंपराओं में छिपा है बस्तर की आत्मा का इतिहास
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//**// बस्तर, छत्तीसगढ़। देशभर में दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरे की पहचान ही बिल्कुल अलग है। यहां दशहरा रावण दहन से नहीं, बल्कि शक्ति की आराधना, आदिवासी संस्कृति, देवी-देवताओं की परंपराओं और मां दंतेश्वरी के प्रति अटूट आस्था से जुड़ा हुआ है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से जीवित एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत है, जिसमें प्रकृति, जनजातीय जीवन, राजपरंपरा और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
इस महापर्व की सबसे विशिष्ट मान्यता है कि माता की अनुमति के बिना बस्तर दशहरा की मुख्य परंपराओं को आगे बढ़ाना उचित नहीं माना जाता। आखिर ऐसा क्यों है? कांटों के झूले पर देवी की स्वीकृति कैसे प्राप्त की जाती है? बस्तर के राजपरिवार का माता से क्या संबंध रहा है? और क्यों यहां विजयादशमी के बाद भी दशहरे की परंपराएं जारी रहती हैं? इन सवालों के जवाब बस्तर की उस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक परंपरा में छिपे हैं, जो इसे देश के दूसरे दशहरा उत्सवों से अलग पहचान देती है।
माता की अनुमति सर्वोपरि, क्योंकि देवी ही हैं बस्तर की अधिष्ठात्री शक्ति
बस्तर की धार्मिक मान्यताओं में मां दंतेश्वरी को क्षेत्र की प्रमुख आराध्य देवी और शक्ति स्वरूपा के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। जगदलपुर स्थित दंतेश्वरी मंदिर और दंतेवाड़ा की देवी परंपरा का बस्तर के जनजीवन में विशेष स्थान है। यहां के लोगों के लिए देवी केवल पूजा की प्रतिमा नहीं, बल्कि आस्था, संरक्षण, परंपरा और सामुदायिक पहचान का केंद्र हैं।
ऐतिहासिक रूप से बस्तर के राजपरिवार की धार्मिक परंपराओं में देवी को सर्वोच्च स्थान दिया गया। राजा स्वयं को देवी का सेवक और प्रतिनिधि मानकर धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी आज्ञा और आशीर्वाद को महत्व देते थे। इसी मान्यता के कारण बस्तर दशहरा की शुरुआत से पहले देवी की अनुमति लेने की परंपरा विकसित हुई।
यह परंपरा एक गहरा संदेश भी देती है—सत्ता से ऊपर आस्था, व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर सामुदायिक परंपरा और उत्सव से पहले देवी के प्रति समर्पण। बस्तर में दशहरा इसी भावभूमि पर आगे बढ़ता है।
पाट जात्रा: लकड़ी के पहले लट्ठे की पूजा से शुरू होती है महापर्व की तैयारी
बस्तर दशहरा की तैयारियों का महत्वपूर्ण आरंभिक चरण है पाट जात्रा। यह अनुष्ठान सामान्यतः श्रावण मास की हरियाली अमावस्या के अवसर पर आयोजित किया जाता है। इसमें दशहरा रथ के निर्माण के लिए उपयोग होने वाली लकड़ी के पहले लट्ठे की पारंपरिक पूजा की जाती है, जिसे स्थानीय परंपरा में विशेष नाम से जाना जाता है।
यह रस्म केवल रथ निर्माण की शुरुआत नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और पूरे आयोजन के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना का प्रतीक भी है। जिस लकड़ी से विशाल रथ तैयार होना है, उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करके प्रकृति और परंपरा के बीच संबंध को स्वीकार किया जाता है।
बस्तर की संस्कृति में जंगल, पेड़, पहाड़ और धरती जीवन के अभिन्न अंग हैं। इसलिए रथ निर्माण की शुरुआत में प्रकृति से जुड़े इस अनुष्ठान का अपना विशेष महत्व है।
काछनगादी: कांटों के झूले पर मांगी जाती है दशहरा मनाने की अनुमति
बस्तर दशहरा की सबसे चर्चित और विशिष्ट परंपराओं में काछनगादी का विशेष स्थान है। आश्विन अमावस्या के आसपास आयोजित होने वाले इस अनुष्ठान को दशहरा उत्सव की औपचारिक स्वीकृति से जोड़ा जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में काछन देवी को बस्तर की रक्षक शक्तियों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
इस परंपरा में मिरगान समुदाय की एक कुंवारी कन्या को देवी का प्रतीक माना जाता है। विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद उसे कांटों से बने विशेष झूले पर झुलाने की रस्म निभाई जाती है। परंपरा के अनुसार, देवी की कृपा और स्वीकृति का संकेत मिलने के बाद दशहरा उत्सव की आगे की प्रमुख रस्मों को संपन्न करने की अनुमति मानी जाती है।
कांटों का झूला इस अनुष्ठान को विशिष्ट पहचान देता है। श्रद्धालुओं के लिए यह देवी के प्रति विश्वास, समर्पण और परंपरा की गंभीरता का प्रतीक है। हालांकि इस रस्म के अलग-अलग विवरण स्थानीय परंपराओं के अनुसार मिल सकते हैं, लेकिन इसका केंद्रीय भाव स्पष्ट है—बस्तर दशहरा केवल मनुष्यों की बनाई हुई आयोजन-योजना नहीं, बल्कि देवी की स्वीकृति से जुड़ा पवित्र पर्व माना जाता है।
जोगी बिठाई: नौ दिनों की साधना और लोकविश्वास
माता की अनुमति से जुड़े प्रारंभिक अनुष्ठानों के बाद बस्तर दशहरा में जोगी बिठाई की परंपरा निभाई जाती है। इस रस्म में एक व्यक्ति सिरहासार भवन में निर्धारित स्थान पर बैठकर नौ दिनों तक साधना करता है।
यह साधना पर्व की निर्विघ्न पूर्णता की कामना से जुड़ी मानी जाती है। जोगी बिठाई बस्तर दशहरा के आध्यात्मिक पक्ष को सामने लाती है, जहां बाहरी उत्सव के साथ तप, ध्यान और आत्मसंयम को भी महत्व दिया जाता है।
इस परंपरा में भाग लेने वाले व्यक्ति की भूमिका केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसे पूरे समुदाय की मंगलकामना से जोड़कर देखा जाता है।
फूल रथ: जब आदिवासी समाज की एकजुटता बनती है आस्था की ताकत
बस्तर दशहरा का विशाल काष्ठ रथ इस महापर्व के सबसे आकर्षक प्रतीकों में से एक है। नवरात्रि के दौरान फूल रथ की परिक्रमा और उससे जुड़े अनुष्ठान उत्सव को विशेष पहचान देते हैं। देवी के छत्र को परंपरानुसार प्रतिष्ठित कर रथ को नगर भ्रमण कराया जाता है।
रथ को खींचने में स्थानीय आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह दृश्य केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम, सहयोग और सांस्कृतिक एकता का जीवंत उदाहरण है।
रथ निर्माण से लेकर उसके संचालन तक विभिन्न समुदायों की परंपरागत भागीदारी इस बात को दर्शाती है कि बस्तर दशहरा किसी एक व्यक्ति, परिवार या समुदाय का आयोजन नहीं है। इसमें पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति और सामुदायिक पहचान समाहित है।
मावली परघाव: माता के स्वागत में झुकता है पूरा बस्तर
बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में मावली परघाव का विशेष महत्व है। इस अवसर पर दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी की डोली और मावली माता के छत्र के जगदलपुर पहुंचने पर परंपरागत स्वागत किया जाता है।
राजपरिवार, पुजारी, जनप्रतिनिधि और श्रद्धालु इस धार्मिक परंपरा से जुड़े रहते हैं। बाजे-गाजे, पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामूहिक श्रद्धा के बीच माता का स्वागत बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करता है।
यह रस्म देवी के प्रति समर्पण के साथ-साथ बस्तर और दंतेवाड़ा की धार्मिक परंपराओं के ऐतिहासिक संबंध को भी दर्शाती है।

भीतर रैनी और बाहर रैनी: जब रथ की परंपरा में झलकती है आदिवासी स्वायत्तता
बस्तर दशहरा की परंपराओं में भीतर रैनी और बाहर रैनी अत्यंत विशिष्ट स्थान रखते हैं। भीतर रैनी के दौरान रथ परिक्रमा और उससे जुड़ी पारंपरिक गतिविधियां होती हैं। इस क्रम में आदिवासी समुदायों द्वारा रथ को प्रतीकात्मक रूप से अपने साथ ले जाने की रस्म भी प्रचलित है।
इसके बाद बाहर रैनी की परंपरा आती है, जिसमें रथ को वापस लाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। लोकपरंपरा में राजा और आदिवासी समुदायों के बीच संवाद, मनुहार तथा सामूहिक सहभागिता को इसका महत्वपूर्ण पक्ष माना जाता है। नवाखानी जैसे सामुदायिक आयोजन नई फसल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के भाव को सामने लाते हैं।
इन रस्मों को केवल रथ के आने-जाने की घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इनमें बस्तर के सामाजिक संबंधों, आदिवासी समुदायों की परंपरागत भूमिका और सामूहिक निर्णय की संस्कृति की झलक दिखाई देती है।
मुरिया दरबार: जहां परंपरा के बीच उठती है जनता की आवाज
बस्तर दशहरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष है मुरिया दरबार। यह परंपरागत सभा रही है, जिसमें विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि, मांझी, चालकी और अन्य परंपरागत पदाधिकारी भाग लेते हैं। ऐतिहासिक रूप से ऐसे आयोजनों में जनसमस्याओं, सामाजिक विषयों और सामुदायिक जरूरतों पर चर्चा का अवसर मिलता रहा है।
मुरिया दरबार बस्तर दशहरा को केवल धार्मिक पर्व से आगे ले जाकर जनजीवन से जोड़ता है। यह बताता है कि किसी समाज की संस्कृति केवल पूजा-पद्धतियों से नहीं बनती, बल्कि उसमें संवाद, सामूहिक भागीदारी और लोगों की समस्याओं को सुनने की परंपरा भी महत्वपूर्ण होती है।
जहां एक ओर देवी की आराधना होती है, वहीं दूसरी ओर समाज की आवाज को स्थान देने की यह परंपरा बस्तर की ऐतिहासिक विशिष्टता को सामने लाती है।
ओहाड़ी: देवी-देवताओं की विदाई के साथ संपन्न होता है महापर्व
बस्तर दशहरा की अंतिम परंपराओं में ओहाड़ी का उल्लेख महत्वपूर्ण है। इस चरण में उत्सव से जुड़े आमंत्रित देवी-देवताओं को परंपरानुसार विदाई दी जाती है। इसके साथ लंबे समय तक चलने वाले इस लोकपर्व का समापन होता है।
शुरुआत में देवी की अनुमति, बीच में विविध अनुष्ठान और अंत में देवी-देवताओं की विदाई—यह पूरा क्रम बस्तर की धार्मिक व्यवस्था और सांस्कृतिक अनुशासन को दर्शाता है।
बस्तर दशहरा का ऐतिहासिक महत्व: राजपरंपरा से जनजातीय संस्कृति तक
बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पहचान बस्तर के राजपरिवार, मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय आदिवासी समुदायों की भागीदारी से जुड़ी है। समय के साथ इस उत्सव ने ऐसा स्वरूप विकसित किया, जिसमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सामुदायिक जीवन की अनेक परंपराएं भी शामिल होती गईं।
यहां हर समुदाय की अपनी भूमिका और जिम्मेदारी रही है। कहीं रथ निर्माण से जुड़ा कार्य, कहीं रस्सी बनाने की परंपरा, कहीं पारंपरिक वाद्ययंत्र, तो कहीं पूजा-अर्चना और देवी-देवताओं के स्वागत की जिम्मेदारी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता यह ज्ञान बस्तर की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बस्तर दशहरा यह भी सिखाता है कि संस्कृति को जीवित रखने के लिए केवल इतिहास जानना पर्याप्त नहीं है। परंपराओं में भागीदारी, स्थानीय समुदायों का सम्मान और अगली पीढ़ी तक उनके महत्व को पहुंचाना भी जरूरी है।
क्यों पूरी दुनिया के लिए खास है बस्तर दशहरा?
बस्तर दशहरा अपनी लंबी अवधि, विशिष्ट देवी परंपरा, रथ अनुष्ठानों और आदिवासी समाज की व्यापक भागीदारी के कारण विशेष पहचान रखता है। इसे अक्सर विश्व के सबसे लंबे दशहरा उत्सवों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सामान्य दशहरे की तरह रावण दहन पर केंद्रित नहीं है, बल्कि मां दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की आराधना को अपना केंद्र बनाता है।
इस महापर्व में प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक सहयोग, धार्मिक आस्था, लोककला और परंपरागत सामाजिक व्यवस्था एक साथ दिखाई देते हैं। आधुनिक समय में भी यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को देश-दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम बना हुआ है।
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी सीख यही है कि यहां उत्सव से पहले देवी की अनुमति, व्यक्तिगत इच्छा से पहले सामूहिक परंपरा और दिखावे से पहले आस्था को महत्व दिया जाता है। मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा से शुरू होकर आदिवासी समाज की एकजुटता और मुरिया दरबार की संवाद परंपरा तक पहुंचने वाला यह महापर्व छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का अनमोल अध्याय है।
बस्तर दशहरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास, प्रकृति और समाज के बीच सदियों से बने रिश्ते की जीवंत गाथा है—एक ऐसी गाथा, जो हर वर्ष दुनिया को बताती है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता में आज भी कितनी अद्भुत परंपराएं सांस ले रही हैं।
