क्यों किया जाता है डांडिया और गरबा? मां दुर्गा की आराधना, शक्ति की उपासना और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है यह परंपरा
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नवरात्रि में डांडिया की खनक और गरबा की थाप के पीछे छिपा है मां आदिशक्ति का महात्म्य, जानिए धार्मिक मान्यता, पौराणिक कथा और इस परंपरा का आध्यात्मिक संदेश
त्रिनेत्र टाइम्स कोरबा **//**//**// कोरबा। नवरात्रि का पर्व आते ही चारों ओर मां दुर्गा की भक्ति, जयकारों और गरबा-डांडिया की गूंज सुनाई देने लगती है। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान, हाथों में डांडिया की लकड़ियां, गोल घेरे में घूमते श्रद्धालु और मां की आराधना में लीन भक्त—यह दृश्य केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और शक्ति की उपासना का भी प्रतीक है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नवरात्रि में डांडिया और गरबा क्यों किया जाता है? इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यताएं हैं और मां दुर्गा की आराधना से इसका क्या संबंध है?
मां आदिशक्ति की आराधना से जुड़ी है गरबा की परंपरा
गरबा मुख्य रूप से गुजरात की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपरा है, जो आज पूरे देश में लोकप्रिय है। इसकी धार्मिक भावना मां दुर्गा और आदिशक्ति की उपासना से जुड़ी हुई है। नवरात्रि के दौरान गरबा करते हुए श्रद्धालु मां जगदंबा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
परंपरागत रूप से गरबा मिट्टी के एक पात्र के चारों ओर किया जाता है, जिसे कई स्थानों पर ‘गरबी’ या ‘गरबो’ कहा जाता है। इस पात्र में दीपक जलाया जाता है। दीपक की लौ जीवन, प्रकाश और दिव्य शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। पात्र के भीतर जलता दीपक और उसके चारों ओर घूमते लोग जीवनचक्र तथा सृष्टि में व्याप्त शक्ति की प्रतीकात्मक व्याख्या से भी जोड़े जाते हैं।
इस परंपरा का आध्यात्मिक संदेश है कि संसार में व्याप्त हर ऊर्जा के मूल में दिव्य शक्ति का भाव है और मां आदिशक्ति उसी सृजन, संरक्षण तथा शक्ति की प्रतीक हैं।
आखिर क्यों किया जाता है डांडिया?
डांडिया गुजरात का एक लोकप्रिय पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसे विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान किया जाता है। इसमें श्रद्धालु हाथों में छोटी-छोटी लकड़ियां लेकर लयबद्ध तरीके से नृत्य करते हैं। इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्या मां दुर्गा की शक्ति, उत्साह और बुराई पर अच्छाई की विजय से जुड़ी हुई है।
एक प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, डांडिया की लकड़ियां मां दुर्गा की शक्ति और उनके दिव्य अस्त्रों का प्रतीकात्मक स्मरण कराती हैं। हालांकि डांडिया की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग लोकपरंपराएं और सांस्कृतिक व्याख्याएं प्रचलित हैं। इसलिए इसे किसी एक पौराणिक कथा से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
डांडिया के दौरान दो लकड़ियों का लयबद्ध तरीके से आपस में टकराना संगीत और सामूहिक ताल का निर्माण करता है। यह अनुशासन, समन्वय, उत्साह और एकता का सुंदर संदेश भी देता है।
मां दुर्गा और महिषासुर की कथा से क्या है संबंध?
हिंदू धार्मिक परंपरा में नवरात्रि का प्रमुख आधार मां दुर्गा और महिषासुर के बीच युद्ध की कथा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से देवता और संसार त्रस्त हो गए थे। तब देवताओं की शक्तियों से मां दुर्गा का प्राकट्य हुआ। मां दुर्गा ने महिषासुर से युद्ध कर उसका वध किया और धर्म की रक्षा की।
यह कथा संदेश देती है कि अन्याय, अहंकार और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की विजय का आदर्श सर्वोपरि है।
नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। गरबा और डांडिया के माध्यम से श्रद्धालु इसी शक्ति-उपासना के उत्सव में भाग लेते हैं। हालांकि डांडिया स्वयं महिषासुर-वध की घटना का ऐतिहासिक या शास्त्रीय पुनराभिनय नहीं है, बल्कि उससे जुड़े शक्ति और विजय के भावों के साथ सांस्कृतिक रूप से जोड़ा जाता है।
नौ दिनों तक क्यों मनाया जाता है शक्ति का उत्सव?
नवरात्रि का अर्थ है—नौ रातें। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। भक्त उपवास, पूजा-पाठ, मंत्र-जाप, भजन, कीर्तन और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से मां की कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं।
नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया का आयोजन भक्ति को सामूहिक उत्सव का रूप देता है। लोग परिवार, मित्रों और समाज के साथ एकत्रित होकर मां की आराधना करते हैं। इससे धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक परंपराओं को भी बढ़ावा मिलता है।
गरबा में गोल घेरे का क्या है आध्यात्मिक अर्थ?
गरबा में श्रद्धालु गोल घेरे में नृत्य करते हैं। इस गोलाकार संरचना को कई सांस्कृतिक और आध्यात्मिक व्याख्याओं में जीवन के निरंतर चक्र, प्रकृति की गति और सृष्टि की निरंतरता से जोड़ा जाता है। घेरे में कोई एक व्यक्ति केंद्र में स्थायी रूप से प्रमुख नहीं होता; सभी अपनी-अपनी लय के साथ एक सामूहिक स्वरूप बनाते हैं।
जब दीपक या मां की प्रतिमा केंद्र में स्थापित होती है, तो उसके चारों ओर घूमना श्रद्धालुओं के लिए अपनी भक्ति को मां के चरणों में समर्पित करने का प्रतीकात्मक भाव बन जाता है। यह गरबा की एक लोकप्रिय आध्यात्मिक व्याख्या है, न कि हर क्षेत्र में समान रूप से मानी जाने वाली कोई एक अनिवार्य धार्मिक व्याख्या।
डांडिया और गरबा केवल नृत्य नहीं, संस्कृति का उत्सव हैं
आज डांडिया और गरबा गुजरात की सीमाओं से निकलकर देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों तक पहुंच चुके हैं। इनके आयोजनों में पारंपरिक वेशभूषा, लोकसंगीत, ढोल, नगाड़े और रंगीन रोशनी उत्सव को आकर्षक बनाते हैं। लेकिन इनकी वास्तविक पहचान केवल संगीत और नृत्य तक सीमित नहीं है।
इनके माध्यम से नई पीढ़ी भारतीय लोकपरंपराओं से परिचित होती है। अलग-अलग आयु वर्ग के लोग एक साथ भाग लेते हैं और सामूहिक उत्साह का अनुभव करते हैं। जब आयोजन श्रद्धा और सांस्कृतिक मर्यादा के साथ होता है, तो यह धार्मिक आस्था, परंपरा और सामाजिक सद्भाव का सुंदर संगम बन जाता है।
राजेंद्र प्रसाद ग्राउंड में गूंजेगी मां की भक्ति और डांडिया की थाप
कोरबा के राजेंद्र प्रसाद ग्राउंड में मां दुर्गा के आगमन के साथ डांडिया-गरबा उत्सव की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। आकर्षक सजावट और जगमगाती रोशनी के बीच यहां नवरात्रि के उल्लास का वातावरण तैयार है। कल शाम से शुरू होने वाला आयोजन श्रद्धालुओं को मां की आराधना के साथ पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक उत्सव से जुड़ने का अवसर देगा।
यह आयोजन इस बात का भी स्मरण कराता है कि नवरात्रि का वास्तविक भाव केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि अपने भीतर साहस, संयम, सद्भाव और सकारात्मकता को जागृत करना है।
मां दुर्गा की आराधना का संदेश
डांडिया की हर थाप और गरबा का हर चक्र मां आदिशक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम बन सकता है। नवरात्रि हमें नारी शक्ति के सम्मान, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, अहंकार का त्याग करने और समाज में प्रेम व एकता बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
मां दुर्गा की उपासना का सार यही है—अपने भीतर की शक्ति को पहचानें, बुराई पर अच्छाई की विजय में विश्वास रखें और जीवन को सद्भाव, सेवा तथा सकारात्मकता से भर दें।
जय माता दी! 🙏
